तहकीकात न्यूज @ वेब डेस्क . बैकुन्ठपुर
क्रिसमस ष्षुक्रवार की दरमियानी रात धूमधाम से उत्साह के साथ मनाया गया। शाम ढलते ही सभी पारीसों के माध्यम पास के चर्चों में विशेष रोशनी की गई थी, जहां विशेष प्रार्थना के साथ चरनी में प्रभु यीशू का जन्म हुआ और फादर ने चरनी की आशीष दी। बुद्धवार को ही चर्चों की सजावट को अंतिम रूप दे दी गई थी, जिसकी चमक ष्गुरुवार शाम देखने को मिली। गौरतलब होकि गुरुवार की रात 12 बजे प्रभु यीशु का जन्म उत्सव मनाया गया। मुख्य रूप से बैकुन्ठपुर, चरचा सहित जिले भर के चर्चों में हजारों की संख्या में ईसाई धर्मावलंबियों की भीड़ ख्रीस्त पर्व मनाने के लिए जुटी। जहां बड़े बुजूर्गों का उत्साह पर्व को लेकर देखा गया, वहीं छोटे बच्चों सहित युवा युवतियों ने भी रंग बिरंगे कपड़ों में सजकर कार्यक्रम में शामिल हुए और प्रभु यीशु के जन्म पर्व का जश्न मनाया। हजारों की संख्या में मसीही समाज के लोग प्रार्थना में शामिल होने के लिए चर्चों में पहुंचें। जिले में सभी गिरजाघरो में इस पर्व को मनाने के लिए व्यापक तैयारी की गई थी, चर्चों में शाम से ही कैरोल गीत गूंजेंने लगे और अर्धरात्रि को बालक यीशु के चुमावन के साथ क्रिसमस की खुशियां बिखरी। ईसाई समाज द्धारा क्रिसमस धूमधाम से मनाया जाता है। शाम से ही ईसाई समाज के लोग बेसब्री से अपने प्रभु के जन्म का पर्व मनाने की प्रतीक्षा करते देखे गए। क्रिसमस को लेकर चर्चों को रंगीन विद्युत झालरों आदि से आकर्षक ढंग से सजाया गया था। जिले के सभी गिरजाघरो में क्रिसमस की प्रार्थना की गई। वहीं शहर के लोग भी इस जश्न से अछूते नहीं रहे। प्रभु के जन्म के बाद से हैप्पी क्रिसमस की बधाइयों का दौर शुरू हुआ। गिरजाघर में विशेष प्रार्थना और प्रभु यीशु के जन्मोत्सव मनाने के लिए बड़ी संख्या में मसीही पहुंचने लगे थे। बुद्धवार देर शाम तक पूरा चर्च परिसर श्रद्घालुओं से भर गया था। यहां कई बड़े शहरों से भी लोग क्रिसमस मनाने के लिए जुटे थे। यहां क्रिसमस की प्रार्थना रात करीब 11 बजे शुरू हुई।

मांदर की थापों की जगह अब डीजे
क्रिसमस को लेकर जहां पहले कभी चार सप्ताह तक विशेष आयोजन किए जाते थे, वहीं अन्य त्योहारों की तरह क्रिसमस में भी आधुनिकता का रंग देखने को मिल रहा है। परंपरागत रूप से ग्रामीण क्षेत्रों में जहां क्रिममस पर लोक गीतों के साथ परंपरागत वाद्य यंत्र मांदर आदि के साथ प्रार्थना और खुशी के गीत गाए जाते थे, वहीं अब कैरोल सांग व डीजे के धुन क्रिसमस पर प्रमुख आकर्षण होते हैं।

लगातार हो रहा है पंरपराओ में बदलाव
क्रिसमस के पर्व को लेकर किसी जमाने में परंपरागत रूप से जहां पूरे चार सप्ताह से विशेष तैयारी और कार्यक्रम का आयोजन किया जाता था, वहीं अब क्रिसमस के कार्यक्रम चार दिन से अधिकतम सप्ताह भर का ही होता है। समय के साथ कई बदलाव देखने को मिल रहे हैं, इस सबंध में समुदाय के समुदाय के लोगो ने बताया कि छुट्टियों की कमी, काम की अधिकता सहित अन्य कई कारण हैं, जिसमें यह बदलाव लाजमी हैं। परंपरागत रूप से देखें तो क्रिसमस के प्रमुख कार्यक्रम गांव में हुआ करते थे और मांदर, ढोल के धुन पर पूरे माह भर गांव में रौनक हुआ करता था। दीप जलाने की परंपरा पुरातन है लेकिन समय के साथ बदलाव आया और दीपों की जगह केंडल ने ली। अब देखने को मिल रहा है कि सजावट के लिए चायनीज लड़ियों की मांग बढ़ी है।
इस अवसर पर कागज से बने स्टार का भी विशेष महत्व होता है, जो कभी साधारण कागजों से बनाया जाता था और अब स्टार की कीमतों में प्लास्टिक व चमकीले कागजों से आकर्षक बनाते हुए वृद्घि हो रही है। पारंपरिक रूप से क्रिसमस पर जो गीत गाए जाते रहे हैं, अब उसका स्थान आधुनिकता ने लिया है और क्रिसमस के समय में विशेष रूप से एलबम आने लगे हैं। अजीत आगे बताते हैं कि आगे पर्व का मूल प्रभू यीशू के जन्म से उत्पन उत्साह है। त्योहार को मनाने के तरीके में बदलाव महत्वपूर्ण नहीं है।
उन्होंने कहा कि प्रभू यीशू के जन्म से उस बालपन को महसूस करना होता है, जिसमें सात्विकता है और बच्चे मन में किसी के भी प्रति द्वेष या दुर्भावना नहीं होता है। क्रिसमस के दिन का संदेश यही होता है कि अपने आप को बच्चे के रूप में महसूस करें और पवित्रता के साथ अपने व्यक्तित्व को समाज में स्थापित करें। समय के साथ यह लाजमी भी है, जिसमें संसाधनों की उपलब्धता और उपलब्धता में सहजता महत्वपूर्ण कारण है। उनका कहना है कि त्योहार को मनाने के उद्देश्य में बदलाव नहीं आना चाहिए।
पारंपरिक मिष्ठानों में भी बदलाव
क्रिसमस पर पारंपरिक मिष्ठानों में भी काफी बदलाव देखने को मिल रहा है। सालनी टोप्पो बताती हैं कि एक समय था, जब क्रिसमस पर चावल से बने अरसा, अनरसा का भी विशेष रूप से इंतजार होता था। घरों में चावल से बने मिष्ठान ही प्रमुख आकर्षण हुआ करते थे। लेकिन अब चावल का अनरसा सिर्फ सांकेतिक या प्रसाद के रूप में ही मिलते हैं और विभिन्न कंपनियों के चाकलेट, गिफ्ट पेक सहित बाजार में मिलने वाली मिठाइयों का अधिक प्रचलन हैं। समय की कमी भी इसका प्रमुख कारण है। अब महिलाएं भी काम करने लगी हैं और सभी के पास समय का भी अभाव है, जिसके कारण रेडिमेड वस्तुओं का अधिक प्रचलन हैं।
आर्टिफिशियल क्रिसमस ट्री
जीवन बताते हैं कि समय के साथ होने वाले बदलाव में क्रिसमस ट्री घरों में स्थापित करने की परंपरा में यह बदलाव सामने देखने को मिल रहा है कि अब लोग आर्टिफिशियल क्रिसमस ट्री का अधिक उपयोग कर रहे हैं। परंपरागत रूप से अरूकेरिया के प्लांट को घर में सजाने की परंपरा थी, लेकिन अब अरूकेरिया के प्लांट की जगह आर्टिफिशियल ट्री ने ले ली है।
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