तहकीकात न्यूज @ वेब डेस्क . बैकुन्ठपुर
जिस कृषि विज्ञान केंद्र की स्थापना शासन के द्वारा इसलिए की गई थी ताकि केवीके नई तकनीकों का परीक्षण करने जैसे कि बीज की किस्में या नवीन कृषि पद्धतियाँ, जिन्हें विकसित कर किसानों को हस्तांतरित होने से पहले नई तकनीकों का स्थानीय स्तर पर परीक्षण कर किसान क्षेत्रों पर नई प्रौद्योगिकियों की प्रभावकारिता दिखाने के लिए कार्यक्रमों का आयोजन कर किसानो को आर्थिक उन्नति की राह दिखाये। किंतु कोरिया जिले के बैकुंठपुर स्थित सलका कृषि विज्ञान केंद्र में ऑस्टर मशरूम की जो बीज किसानों को उपलब्ध कराई जाती है उसमें से 30 से 40 फिसद बीजों में अंकुरण नहीं होने की शिकायत लगातार मशरूम उत्पादक कर रहे हैं।
इस दौरान कृषि विज्ञान केंद्र बैकुंठपुर की कार्यशैली को लेकर विगत दो-तीन वर्षों से लगातार सवाल उठ रहे हैं । किंतु आंकड़ों की बाजीगरी में उस्ताद माने जाने वाले अधिकारियों की तमाम कमियां और नाकामियों आज तक सामने नहीं आ पाई । यही कारण है कि किसानों की उन्नति के लिए विगत 4 से 5 वर्षों से चलाए जा रहे हैं मशरूम उत्पादन की योजनाओं में हितग्राहियों का लाभ कम एवं नुकसान ज्यादा हो रहा है और यही कारण है कि कोरिया जिले में आज भी बाहर से मशरूम की आवक हो रही है और यहां के स्थानीय किसान शासन की तमाम महत्वकांक्षी योजनाओं के बावजूद भी अपने आप को ठगा सा महसूस कर रहे हैं।
शासन के पैसे की बंदरबांट एवं योजनाओं का बंटाधार किस तरीके से किया जाता है इसका जीता जागता उदाहरण बैकुंठपुर के कृषि विज्ञान केंद्र में अधिकारियों एवं कर्मचारियों से सीखा जा सकता है। बड़ी-बड़ी डिग्रियों से सुशोभित यहां के डॉक्टर व वैज्ञानिक यदि किसानों को लाभ नहीं पहुंचा पा रहे हैं यही कारण है कि क्षेत्र के किसान अपने आपको ठगा सा महसूस करते हैं ज्यादातर योजनाओं को कागजों में ही चलाया जाता है किसानों को शासन की महत्वकांक्षी योजनाओं का लाभ नहीं मिल पाता है एवं किसान आर्थिक उन्नति से लगातार वंचित रह जाते है।
पहचानवाद का षिकर केवीके

किसी भी विभाग में अधिकारी कर्मचारी अधिकारी यदि एक ही स्थान पर कई वर्षो से जमे रहे तो वह पहचान वाद एवं भाई भतीजावाद का शिकार हो ही जाता है ऐसा ही कुछ उदाहरण कृषि विज्ञान केंद्र बैकुंठपुर में नजर आ रहा है जहां के अधिकारी काफी वर्षो से एक ही स्थान पर जमे होने के कारण इनके द्वारा लगातार अपने लोगों को लाभ पहुंचाने के उद्देश्य कार्य किया जाता है । जहां पर एक समूह बनाकर के अपने चाहने वालों को मदद पहुंचाई जा रही है।
5 वर्षों में उपलब्धि शून्य
विगत 5 वर्षों के दौरान केंद्र एवं राज्य सरकार के द्वारा किसानों को आर्थिक उन्नति देने के उद्देश्य के तहत मशरूम उत्पादन से संबंधित कई योजनाओं का संचालन कृषि विज्ञान केंद्र के माध्यम से किया जाता रहा है। जिसमें किसानों को मशरूम उत्पादन के तकनीकी बारीकियों बताये जाने थे किंतु कृषि विज्ञान के द्वारा चंद पहुंच वाले लोगों को इसका लाभ दिया जाता है और बाकी सारा खेल कागजों में खेल खेला जा रहा है। लोगों बताते हैं कि कुछ कर्मचारीयो को ही कृषि विज्ञान केंद्र की तमाम योजनाओं का लाभ दिया जाता है जिनसे अधिकारियों की सेटिंग रहती है। उन्हें मुफ्त के बीच दवा आदि उपलब्ध तो करा दी जाती है। किंतु जनकपुर सोनहत खडगवा से बीज लेने आने वाले किसानो को भटकने को विवष होना पडता है। और उन्हे कभी कभार दी भी जाती है तो घटिया एवं दोयम दर्जे जिससे किसानों को आर्थिक लाभ होने के बजाय उनकी नुकसान हो रहा है जिस कारण शासन की उन्नति देने वाली योजनाएं लोगों को नुकसान पहुंचाने लगी है।
कृषि विज्ञान केंद्र में नहीं बनाई जाती बीज
मशरूम उत्पादन के लिए किसानों को प्रोत्साहित करने के तहत कृषि विज्ञान केंद्र में बीज का उत्पादन कर किसानों को प्रदान किए जाने के लिए शासन ने स्पष्ट आदेश दिया था। किंतु बैकुंठपुर में ऐसा कुछ होता नजर नहीं आ रहा है यहां के अधिकारियों के मनमाने के कारण कभी कभार जो बीज किसानों को उपलब्ध कराई जाती हैं वह रायपुर से कृषि विज्ञान केंद्रों में कभी कभार लाकर खानापूर्ति कर दी जाती हैं ।
वर्जन …..
किसानों को शासन की योजनाओं का लाभ दिया जा रहा है सारे आरोप बेबुनियाद एवं निराधार है ।
आर एस राजपूत – संस्था प्रमुख कृषि विज्ञान केंद्र सलका बैकुंठपुर
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