तहकीकात न्यूज @ सुरजीत सिंह रैना . मनेन्द्रगढ
नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल NGT के कड़े नियम के बाद भी बायो मेडिकल वेस्ट (जैव चिकित्सकीय कचरा) के उचित निस्तारण का बंदोबस्त नहीं किया जा रहा है। जिस कारण गंभीर बीमारियों के फैलने वजह बन सकता है। छत्तीसगढ़ पर्यावरण संरक्षण बोर्ड से मान्यता प्राप्त अस्पतालों व क्लीनिक संचालकों द्वारा मेडिकल निपटान के रिकॉर्ड की जानकारी भी नहीं दी जा रही है। वही एस ई सी एल द्वारा संचालित केंद्रीय चिकित्सालय आमाखेरवा मनेंद्रगढ़ के प्रबंधन द्वारा भी इस मामले में गंभीर चूक की जा रही है। चिकित्सालय परिसर में ही एक ओर खुले में मेडिकल वेस्ट को फेंका जा रहा है। महज एक सूचना बोर्ड व टूटी फूटी तार की घेराबंदी कर अस्पताल प्रबंधन आंख बंद कर खतरे से अनजान बनने की नाकाम कोशिश कर रहा है।
जानवर खा रहे मेडिकल वेस्ट :- केंद्रीय चिकित्सालय आमाखेरवा परिसर में अस्पताल प्रबंधन द्वारा बनवाया गया बायो मेडिकल लिक्विड प्लांट व बायो मेडिकल वेस्ट निर्धारित स्थान महज आंखों में धूल झोखने के लिए बनाया गया है। वही बायो मेडिकल वेस्ट निर्धारित स्थान में जानवरों की आवाजाही के कारण गंभीर खतरा होने की सम्भावना से इंकार नहीं किया जा सकता है।
मेडिकल वेस्ट से गंभीर बीमारियां :- मेडिकल वेस्ट को जलाने व खुले में फेकने से कैंसर व अन्य गंभीर बीमारियां हो सकती है। एवं मेडिकल वेस्ट जैसे केमिकल से भीगी रूई , एक्सपायरी दवाई , सीरिंज आदि से वातावरण के लिए खतरा हो सकता है।
बायो मेडिकल वेस्ट रखने के नियम :-
नीला बैग :- कांच की सीरिंज , निडिल , धातु की धारदार सामान व ग्लास का टूटा सामान।
पीला बैग :- सनी हुई रूई , संक्रमित कचरा , प्रयोगशाला का कचरा व रोगी का कचरा ।
लाल बैग :- कैथेटर , आर बी बोतल , कैनुला , ट्यूब
काला बैग :- बलगम , यूरिन , मवाद , संक्रमित कपड़े , ऒटी के कपड़े, लेबर रूम के कपड़े ।
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