खण्ड वर्षा और खेती की लागत बढ़ने से किसान परेशान

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तहकीकात न्यूज  @  वेब डेस्क . बैकुन्ठपुर


परंपरागत खेती में दिहाड़ी मजदूरी और तकनीकी खेती में पेट्रोल- डीजल के दाम बढ़ने से खेती की लागत बढ़ गई है। बैल हल से जुताई में जहां 500 से 600 रूपये ली जा रही है। वहीं ट्रैक्टर जुताई के एवज में 1200 से 1400 रूपये प्रति घंटे किराया लिया जा रहा है। दोनों दर बीते वर्ष से 300 रूपये अधिक है। खेत में दिहाड़ी मजदूरी के लिए मजदूर 250 के बजाए अब 300 रूपये ले रहे हैं। खाद व बीज की कीमत पहले से ही सात से 10 रूपये प्रति किलो बढ़ी है। कोरोनाकाल की आर्थिक मंदी में किसानों के लिए नकद खेती अब आसान नहीं। ऐसे में किसानों को आर्थिक नुकसान हो रहा है। किसान अब निजी दुकानों से खाद-बीज ले रहे है।

खण्ड वर्षा बन रही बाधा


बारिश साथ नहीं मिलने से बोआई बाधित है। थरहा तैयार होने में पखवाड़े भर का समय लगेगा। खंड बारिश के कारण जिले में खेती कहीं प्रगति में कहीं सुस्त है। कम वर्षा की वजह से उपरी मैदानी खार खेत जहां पानी रूकने की संभावना कम रहती है, में खेती पिछड़ी हुई है, वहीं पानी रूकने की संभावना वाले खेतों में कृषि कार्य प्रगति में है। शहर में नौकरी करने वाले लोग गांव की जमीन को अधिया देकर पहले काम चलाते थे। अब जबकि लागत बढ़ गई है ऐसे में किसानों को अधिया में बोआई नागवार साबित हो रहा है।

खेती की लागत में 35 फिसद

सिंचाई सुविधा का विस्तार नहीं होने की वजह से आज भी जिले के अधिकांश किसान परंपरागत खेती पर निर्भर है। बियासी केवल हल-बैल से ही किया जा सकता है। ऐसें में वे किसान जो बियासी खेती कर रहे हैं, उनके लिए लागत में बढ़त समस्या का सबब बना हुआ है। खेतों दिहाड़ी मजदूरी 300 से 350 रुपये हो गई है। बीते वर्ष की अपेक्षा यह 100 रुपये अधिक है। प्रति एकड़ 5000 तक में रोपाई होने वाले खेतों में अब 9000 रुपये लग रहा है। कुल मिलाकर जुताई, रोपाई से लेकर बियासी की मजदूरी लागत बढ़ने से किसान चिंतित नजर आ रहे हैं।

नगद फसलो पर जोर

धान की फसल वर्षा आश्रित होने के कारण अब लोगो का रुझान प्रारंभिक तौर पर तैयार होने वाले सब्जी फसल बरबट्टी, तरोई, कद्दू, में प्रगति है। जबकि टमाटर, बैगन, सेम, मूली आदि की बुआई के लिए भी मांद तैयार की जा रही है। लोकल सब्जियों के तैयार होने में समय लगेगा। इस आशय वर्तमान में आयातित सब्जी की की कीमत बढ़ने लगी है।

वर्मी कम्पोस्ट का हो रहा ज्यादा उपयोग

रासायनिक उर्वरकों की दिनों-दिन बढ़ती कीमत से कृषि लागत बढ़ती जा रही है। लागत की तुलना में लाभ कम होता जा रहा है। रासायनिक उर्वरकों एवं पेस्टीसाइड्स के अंधाधुंध प्रयोग से भूमि की उर्वरा शक्ति कम हो रही, वहीं कृषि उत्पाद में विषैले तत्वों की मात्रा बढ़ रही है। जिसका दुष्प्रभाव लोगों की सेहत और पर्यावरण पर पड़ रहा है। इन समस्याओं के निदान के उद्देश्य से छत्तीसगढ़ राज्य में जैविक खेती को प्रोत्साहित कर रहे हैं। गोधन न्याय योजना के अंतर्गत 2 रुपये किलो में गोबर की खरीदी की जा रही है, जिससे स्व-सहायता समूह की महिलाएं वर्मी कम्पोस्ट और सुपर कम्पोस्ट बना रही हैं। वर्मी कम्पोस्ट और सुपर कम्पोस्ट के विक्रय की व्यवस्था सोसायटियों के माध्यम से की गई है। किसान को वर्मी कम्पोस्ट मात्र 10 रुपये किलो और सुपर कम्पोस्ट 6 रुपये किलो की दर से उपलब्ध कराई जा रही है।

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