देवउठनी एकादशी पर तुलसी विवाह के बाद 19 से गुंजेगी शहनाई…….

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Baikunthpur @ Tahkikat News

देवउठनी एकादशी का पर्व लोगो नेे उत्साह और उमंग के साथ मनाया जाएगा। इसके लिए घर-घर गन्ने का मंडप सजा कर तुलसी विवाह की पूजा किया। देवउठनी (देवप्रबोधिनी एकादशी) पर्व को लेकर घरों में तैयारी पहले ही कर ली गई थी। इस सबंध में जानकारी देते हुए महिला नेत्री संगीता राजवाडे बताती हैं कि इस पर्व में भगवान विष्णु को धूप, दीप, नैवेद्य, फूल, गंध, चंदन, फल और अर्घ्य आदि अर्पित कर पूजा-अर्चना की जाती है। देवउठनी एकादशी पर्व में घरों में गन्ने से मंडप सजाया जाता है। इसके चलते देवउठनी एकादशी पर्व में गन्ने की विशेष मांग रहती है। पूजन में खास तौर पर इस्तेमाल मंडप के लिए उपयोग आने के कारण गन्ने की मांग इस पर्व में बढ़ जाती है।

त्योहार विशेष में गन्ने की खपत को देखते हुए कोरिया जिले के अलावा अन्य जिले से भी काफी संख्या में गन्ना उत्पादक और विक्रेता शहर पहुंचते हैं। इस साल भी काफी संख्या में गन्ना बेंचने के लिए यहां किसान पहुंचे।
शहर में गन्ना बेचने वालो ने बताया कि इस साल प्रति जोड़ी गन्ने को 50 रुपये से 70 रुपये में बेच रहे हैं। इस साल क्षेत्र में लगातार मौसम में उतार-चढ़ाव होने के कारण गन्ने के उत्पादन में असर पड़ा है।

गन्नो के मंडप तले तुलसी व शालिग्राम का विवाह

सोमवार को कार्तिक शुक्ल पक्ष की एकादशी पर देवउठनी त्यौहार धूमधाम से मनाया गया। पर्व को लेकर श्रद्धालुओं में उल्लास देखी जा रही है। दिन भर बाजार में पूजा सामानों की खरीदारी के लिए रौनक बनी हुई है।

19 से गुंजेगी शहनाई

देव उठनी पर्व के पश्चात विवाह लग्न का योग कार्तिक शुक्ल पूर्णिमा 19 नवंबर से शुरू हो रहा है। इस वर्ष मुहुर्त की भरमार देखी जा रही है। खरमास के दौरान विवाह आयोजन में विराम रहेगी। विवाह आयोजन को लेकर जनवासा बारातघर, बैंड बाजा, बाराती वाहन आदि की बुकिंग अभी से शुरू हो गई है। वैवाहिक आयोजन लेकर व्यवसाइयों के चेहरे पर रौनक देखी जा रही है।

यह है धार्मिक मान्यता

धार्मिक कथा के अनुसार महासती वृंदा दैत्यराज जालंधर की पत्नी थी। जालंधर बहुत ही अत्याचारी दानव था, किंतु वृंदा के सतित्व के कारण देवता भी उसका बाल बांका नहीं कर सकते थे। धर्म की रक्षा के लिए विष्णु ने सती से छल किया। जिससे जालंधर का वध हुआ। सती ने विष्णु को शाप दे दिया जिससे वह पाषाण हो गए। लक्ष्मी के आग्रह पर तुलसी ने विष्णु को यथावत कर दिया। भगवान ने तुलसी के सतीत्व से प्रसन्ना् होकर तुलसी पौधे के रूप में उत्पन्ना होने का वरदान दिया

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