जिले के पोडी बचरा में पशुओं की मौत का कारण बन रही गलघोंटू बीमारी
बैकुंठपुर।
कोरिया जिले के पोडी बचरा में बहुत से पशुओं की मौत की बात कही जा रही है। हालांकि वास्तविक बीमारी का पता तो जाच के बाद ही लेगेगा । मगर इतना तय है कि गलघोंटू बीमारी से ग्रसित पशु को समय रहते उपचार न मिले तो उसकी मौत निश्चित है। गलघोंटू बीमारी पाश्चरूला मल्टोसिडा नामक जीवाणु से होती है। यह बीमारी गाय और भैंस में पशु पर पडऩे वाले दबाव के समय ज्यादा फैलती है। इसीलिए इस बीमारी का नाम सिपिंग फीवर या टांसपोर्ट फीवर भी कहते हैं। जब वातावरण बदलता है तो पशु पर दबाव की वजह से टांसिल और नेजोफैरिंजल में रहने वाला यह जीवाणु सक्रिय हो जाता है। इससे पशु दबाव की वजह से इस बीमारी से लडऩे में सक्षम नहीं रहता।
पशु विभाग के ढीले ढाले रवैया पर भाजपा किसान मोर्चा प्रदेश कार्य समिति सदस्य रेवा यादव आपत्ति जताते हुए कहा कि विभाग का काम करने का तरीका बहुत ही गलत है । जब तक किसी क्षेत्र में जन भावना नहीं भडकती तब तक विभाग जागता ही नही हैं । इससे पूर्व में इसी तरीके के विभाग की हरकत रही उन्होंने कहा कि पोडीबचरा में पशु चिकित्सालय में एक डॉक्टर, एक एभीएफओ व एक चपरासी की पोस्टिंग है जबकि यह लोग कभी कभार ही अस्पताल खोलने जाते हैं । इन लोगों की लापरवाही की वजह से लगातार क्षेत्र में पशुओं की मौत हो रही है जोकि किसी प्रकार से बर्दास्त नहीं किया जाएगा । इसकी शिकायत सभी उच्च संस्थानों में की जाएगी । उन्होने कहा कि मैं भी एक पशुपालक हूं पोड़ी बचरा वे जिस प्रकार से गलघोटू के टीकाकरण नही होने से पशुओं की मौत हो रही है यहां तक की गोठनों में भी पशुओं की मौत होने की खबरें आई है। विभाग द्धारा शासन के तमाम दिशा निर्देशों का बावजूद इस तरीके की हरकत कतई बर्दाश्त नहीं किया जाएगा।
इस तरह फैलती है गलघोंटू बीमारी
यह बीमारी छूत की बीमारी है। जब गलघोटू से ग्रसित कोई भी पशु झुंड में बांधा जाता है तो यह बीमारी अन्य स्वस्थ पशुओं में सांस द्वारा, बचा हुआ झूठा चारा खाने से, बीमार पशु के नजदीक आने से, बीमार पशु के मुंह से पडऩे वाली लार से या गांव के जोहड़ में बीमार पशु के जाने से फैलने की सबसे ज्यादा संभावना होती है।
इस तरह करें बचाव
यह बीमारी वातावरण बदलने के साथ पशु पर आने वाले दबाव की वजह से ज्यादा फैलती है। हर पशु को टीकाकरण जरुर कराएं क्योंकि एक बार यह बीमारी होने के बाद पशु को बचाना मुश्किल हो जाता है। इस बीमारी से बचाने के लिए हमें अचानक पशु के खानपान या वातावरण में बदलाव नहीं करना चाहिए। जहां भी पशु बांधे जाएं वह जगह हवादार होनी चाहिए।
ये हैं बीमारी के लक्षण
देखा जाए तो सामान्य पशु का तापमान 101 डिग्री होता है। मगर इस बीमारी में पशु का तापमान अचानक 106 से लेकर 107 डिग्री तक बढ जाता है। पशु के मुंह से लार टपकने लगती हैं। पशु दबाव में आ जाता है। पशु के गले के नीचे सूजन आ जाती है। यह अगले पैरों के बीच तक पहुंच जाती है। पशु को सांस लेने में दिक्कत होती है। कुछ पशुओं में निमोनिया जैसी स्थिति पैदा हो जाती है। कई पशुओं में आंखों से पानी गिरना भी शुरू हो जाता है।





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