आई कोरोना वायरस महामारी-

साल 2020 की शुरुआत होने कुछ समय पहले दुनिया के लिए कोरोना वायरस के बारे में लोगों ने सुना शुरूआत में यह चीन के वुहान शहर में। धीरे-धीरे यह पूरे शहर फिर देश को अपनी जद में लिया और यह दुनिया के नया, अजीब और खतरनाक वायरस है। आज दुनिया का कोई कोना इस वायरस से बचा नहीं है। इस वायरस ने अब तक 17 लाख 50 हजार लोगों की जान ले ली है। इससे ही हम इस वायरस के बारे में अन्दाजा लगा सकते ही कि यह कितना खतरनाक है।
WHO ने इसे महामारी घोषित कर रखा है। इस वायरस की उत्पत्ति के बारे में अभी कोई ठोस सबूत नहीं। कुछ देश इसे चीज की साजिश मानते हैं। इस वायरस को लेकर दुनिया के अलग-अलग लोगों के अलग ख्याल है। WHO इस वायरस की मूल उत्पत्ति में कारणों का पता लगाने में लगा हुआ है। 2020 में दुनिया सबसे बड़ी घटनाओं में यह महामारी सबसे बड़ी घटना है।
जिसने लोगो के रहन-सहन,खान-पान, व्यवहार, सोचने समझने की क्षमता को बहुत हद तक प्रभावित किया। लोग अपने घरों में कैद रहने को मजबूर हुए। लोग इस महामारी की वजह से करोड़ों लोगों के रोजगार छिन गया। तरकरीबन हर उम्र के व्यक्ति को मानसिक प्रताड़ना सहनी पड़ रही है। दुनिया मे बही भी लगभग सभी स्कूल और कॉलेज बन्द है। स्कूल कालेज न खुलने की मानसिक रूप से परेशान बच्चों के सुसाइड करने की घटनाएं आम हो गई है। कोरोना वायरस आने के बाद पूरी में घरेलू हिंसा में वृद्धि देखी गई है। अब साल के खत्म होने के साथ ही दुनिया भर के लोग इस महामारी के खत्म होने की आशा कर रहे हैं।
अमेरिका और ईरान युद्ध के लिए आमने-सामने

नए साल 2020 की का अभी तीसरा दिन हुआ था। दुनिया अभी कोरोना वायरस से को लेकर आने वाली तरह-तरह की खबरों से डरी हुई थी कि अमेरिका द्वारा 3 जनवरी 2020 को इराक के बगदाद शहर एक ड्रोन के द्वारा ईरान के सुप्रीम कमांडर कासिम सुलेमानी को मार गिराया। 17 मार्च 1957 को ईरान के दक्षिण-पश्चिम प्रान्त के किरमान में सुलेमानी का जन्म हुआ था।
कासिम बचपन में बहुत गरीब थे। कासिम सुलेमानी ने अपने सैन्य कैरियर की शुरुआत 1980 के ईरान-इराक युद्ध से शुरू किया। सुलेमानी का नाम चर्चा में तब आया जब 2014-2015 में उनके द्वारा आईएसआईएस (ISIS) के खिलाफ लड़ाई में कुर्द फ़ोर्स के सफल नेतृत्व के बाद आया। अपनी मौत तक सुलेमानी ईरान के रेवोल्यूशनरी गार्ड के अंतर्गत आने वाली विदेशी यूनिट कुर्द फोर्स के प्रमुख थे।
जो ईरान को विदेश में होने वाली सैन्य कार्रवाही में ईरान सरकार का साथ देता था।जो सीधे ईरान के सुप्रीम लीडर आयातुल्ला अली ख़ामेनई को रिपोर्ट करती है। कासिम सुलेमानी को ईरान का दूसरा सबसे ताकतवर शख्स जाता था।कासिम की मौत के बाद ईरान और अमेरिका में युद्ध जैसे हालात बन गए थे। अमेरिका का बड़े पैमाने विरोध हो रहा था ईरान में ईरान की जनता सड़को पर उतर आयी। ईरान ने अपनी मिसाइल अमेरिकी दूतावासों की ओर तैनात कर दी।
बगदाद में अमेरिकी दूतावास पर प्रदर्शनकारियों ने हमला कर दिया। इस हमले के लिए अमेरिका ने ईरान पर आरोप लगाया। मामला तब थोड़ा शान्त हुआ जब ईरान ने अमेरिकी सैन्य ठिकानों पर हमला करने का दावा किया और 80 अमेरिकी सैनकों के मार गिराने का दावा किया। इस बीच ईरान ने अपने यात्री विमान को ही मार गिराया था जिससे ईरान की दुनिया भर में किरकिरी हुई।
आर्मेनिया और अजरबैजान के बीच छिड़ी जंग

जहाँ एक तरफ दुनिया कोरोना महामारी से लड़ रही है और दूसरी तरफ यूरोप के दो देश ईसाई बहुल देश आर्मेनिया और मुस्लिम बहुल देश अजरबैजान के बीच दशकों पुराने विवाद ने जंग का रूप ले लिया। इस युद्ध के होने का कारण 4 दशक पुराना है।
बात 1980 की है जब सोवियत संघ का विघटन हुआ तो नागोर्नो-करबख जो ईसाई बहुल क्षेत्र था जिसे सोवियत संघ ने आर्मेनिया को दे दिया जो पहले अजरबैजान का हिस्सा था और यहीं से विवाद शुरू हो गया। जब से लेकर आज के समय में इन दोनों देशों के बीच इस क्षेत्र को लेकर कई बार युद्ध हो चुका है जिसका कोई निर्णय नहीं निकल पाया।
यह युद्ध तकरीबन 2 महीने चला और 2 महीने बाद रूस के हस्तक्षेप से युद्धविराम की घोषणा आर्मेनिया के नागोर्नो-करबख के क्षेत्र के खाली करने की शर्त पर हुआ। युद्ध से केवल हानि होती है। इस युद्ध मे कम से कम 2000 लोगों के मारे जाने की खबर है और हजारों लोग घायल हुए है। जिसमें सैनिक और आम आदमी भी हैं।
इस युद्ध मे आर्मेनिया को काफी नुसकान इसमें उसके 185 टैंक, 44 इन्फेंट्री ,147 आर्टिलरी गन, 72 राकेट लॉन्चर्स 12 रडार इसके जान-माल का भारी मात्रा में नुसकान उठाना पड़ा। अजरबैजान के युद्ध जीतने में तुर्की और इजरायल का बहुत बड़ा हाथ रहा तुर्की ने अजरबैजान की सहायता के लिए अपने सैन्य उपकरण के अलावा अपने लड़ाके भी भेजे। इजरायल के ड्रोन अजरबैजान के लिए बहुत कारगर रहा। इस युद्ध में अजरबैजान को भी काफी नुसकान उठाना पड़ा।
अमेरिका में जब लाखों लोग सड़कों पर उतरे-

जब अमेरिका में कोरोना के प्रतिदिन लगभग 1 लाख के करीब केस आ रहे थे और प्रतिदिन 2 से 3 हजार लोगों की मौत हो रही थी। एक तरफ पूरा अमेरिका सड़कों पर उतर आया था 2020 की सबसे बड़ी घटनाओं में से एक अमेरिका में हुए विरोध प्रदर्शनों को अलग नहीं किया जा सकता।
जब एक अमेरिकी अश्वेत 46 वर्षीय जार्ज फ्लॉयड की मौत पुलिस हिरासत में हो जाती है और इस घटना का वीडियो वायरल हो जाता है। जिसमें पुलिस उसकी गर्दन को दबाए हुए हैं। वो इसे छोड़ने के लिये कहता है उसे सांस की बीमारी होती है और इस कारण उसकी मौत हो जाती है।
इसके बाद पूरा अमेरिका गुस्से से उबल पड़ा। लाखों लोग सड़कों पर उतर आते हैं और जार्ज फ्लॉयड के लिये न्याय की मांग करने लगे। विरोध प्रदर्शनों के दौरान पुलिस और लोगों के बीच झड़प भी हुई जिसमें कई लोगों को अपनी जान से हाथ धोना पड़ा।
इन सब के बीच अमेरिकी सरकार को मोर्चा संभालने सेना बुलानी पड़ती है। न्यूज एजेंसी एपी के अनुसार वाशिंगटन के व्हाइट हाउस के बाहर सैकड़ों प्रदर्शन करने लगे तो राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप को बंकर में जाना पड़ा। अमेरिका के सभी राज्यों में बहुत बड़े पैमाने पर विरोध देखने को मिला। यह विरोध काफी दिनों तक चला। इस घटना को लेकर यूरोप के देशों में भी काफी विरोध देखने को मिला। एक बात पर गौर किया जा सकता है कि अमेरिका में डोनाल्ड ट्रंप के राष्ट्रपति बनने के बाद से ही अमेरिका में सफेद रंग या फिर नस्ली भेदभाव का पुनरुत्थान होता दिखता है।
संयुक्त राष्ट्र की एक रिपोर्ट के मुताबिक अमेरिकी कानून प्रवर्तन अधिकारियों के द्वारा अफ्रीकी अमेरिकियों मरने और उनके साथ दुर्व्यवहार उनका शोषण करने की गंभीर हालत है। अश्वेतों को कैद किए जाने की संख्या श्वेतों से 5.9 गुना अधिक है। इस बात से पता लगाया जा सकता है कि अमेरिका में अश्वेतों का किस प्रकार शोषण किया जा रहा है।
अमेरिका में बदलती सत्ता तथा दुनिया पर पड़ने वाला प्रभाव-

डोनाल्ड ट्रंप को हराकर अमेरिका के 46वें राष्ट्रपति निर्वाचित होने वाले बिडेन के जीतने के बाद अमेरिका का प्रभाव दुनिया पर तथा भारत पर किस प्रकार पड़ेगा। बिडेन के क्या मायने है और यह 2020 में घटित होने वाली प्रमुख घटनाओं में कितना महत्व है। ऐसा पहली बार था जब अमेरिका में 16 करोड़ से ज्यादा लोगों ने वोट डाला। जिसमें से साढ़े सात करोड़ वोट सिर्फ जो बिडेन को मिला। इनका राजनैतिक करियर पांच दशक से भी ज्यादा पुराना है, यह वर्ष 1973 में पहली बार अमेरिका के सांसद बने थे ।
20 नवंबर 1942 को जो बिडेन का जन्म पेंसिलवेनिया में हुआ था जो बिडेन 25 वर्ष की उम्र में राजनीति में आए थे। लेकिन एक भयानक दुर्घटना में उन्होंने अपनी पत्नी और 13 महीने की बेटी को खो दिया लेकिन उसके बाद भी उन्होंने सीनेट का चुनाव लड़ा और जीता भी। वर्ष 2007 में एक बार फिर अमेरिका के राष्ट्रपति बनने में दौड़ शामिल हुए पर , उन्होंने अपनी उम्मीदवारी वापस ले ली।
उपराष्ट्रपति के तौर पर व्हाइट हॉउस में पहुचे। हालांकि जो बिडेन पर कई बार आरोप भी लगे है जिनमें सबसे बड़ा आरोप इराक युद्ध था। 2002 के इराक के युद्ध के समर्थन में वोट दिया था जिसे बाद में इसे अपनी बड़ी गलती मानी थी। 1978 में उन्होंने एक विवादित कानून का समर्थन भी किया था और उन पर रंग भेदी होने के भी आरोप लगे। बिडेन के राष्ट्रपति बनने से दुनिया कुछ बड़े बदलाव भी देखने को मिल सकते है बहुत पुराने समय से ही अमेरिका को विश्व का नेता माना जा रहा है शायद ही ऐसा कोई बड़ा आंतरिक मामला हो जिसने अमेरिका ने हस्तक्षेप नहीं किया हो।
इससे पहले के राष्ट्रपतियों का अन्य देशों के आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप के आरोप लगते रहे है चाहे वह पहली बार 2008 में बने राष्ट्रपति बराक ओबामा हो इन पर भी पूरी दुनिया में दखलअंदाजी करने का आरोप लगा थे चाहें वह जॉर्ज बुश हो उन पर भी अफगानिस्तान जैसे देशों के साथ युद्ध शुरू करने तथा इस्लामिक देशों में जबरदस्ती घुसने के आरोप लगे इसीलिए जब ओबामा दोबारा राष्ट्रपति बने तो अमेरिका ने इस दखलअंदाजी को थोड़ा कम किया लेकिन पर्दे के पीछे से राष्ट्रपति का नियंत्रण जो बिडेन के हाथ में था डोनाल्ड ट्रंप ने आने के बाद दुनिया की परवाह करना छोड़ दिया तथा महान बनने के लालच में अपने देश को मोटे तौर पर दुनिया से अलग-थलग कर दिया था।
उन्होंने कई आंतरिक संगठन से अमेरिका को बाहर निकाल लिया और शरणार्थी और प्रवासियों के लिए अमेरिका के दरवाजे लगभग बंद ही कर दिए। लेकिन बिडेन के अनुसार अमेरिका एक बार फिर आंतरिक मुद्दों पर दुनिया का नेतृत्व करेगा। साथ ही साथ इमीग्रेशन एच वन वी विजा के मुद्दे पर भी बिडेन साफ्ट रुख अपना सकते हैं ट्रम्प शासन के दौरान प्रवासी के लिए वीजा हासिल करना तथा नागरिकता करना बहुत मुश्किल हो गया था ।
बिडेन इस प्रक्रिया को थोड़ा आसान बना सकते हैं आतंकवाद को भी लेकर बिडेन सख्त रुख अपना सकते हैं परंतु चीन के साथ बातचीत संभल कर चलेंगे डोनाल्ड ट्रंप चीन और भारत की सीमा विवाद को लेकर भारत का खुलकर समर्थन करते थे परंतु बिडेन के बारे में कुछ कह पाना बहुत मुश्किल है हालांकि वह भारत के साथ मजबूत संबंधों के पक्षधर रहे हैं।
2020 ——- दुनिया की सबसे चर्चित घटनाएं————-और दुनिया पर असर
आई कोरोना वायरस महामारी-
साल 2020 की शुरुआत होने कुछ समय पहले दुनिया के लिए कोरोना वायरस के बारे में लोगों ने सुना शुरूआत में यह चीन के वुहान शहर में। धीरे-धीरे यह पूरे शहर फिर देश और फिर पूरी को अपनी जद में लिया और यह दुनिया के नया, अजीब और खतरनाक वायरस है। आज दुनिया का कोई कोना इस वायरस से बचा नहीं है। इस वायरस ने अब तक 17 लाख 50 हजार लोगों की जान ले ली है। इससे ही हम इस वायरस के बारे में अन्दाजा लगा सकते ही कि यह कितना खतरनाक है।
WHO (वर्ल्ड हेल्थ ऑर्गेनाइजेशन) ने इसे महामारी घोषित कर रखा है। इस वायरस की उत्पत्ति के बारे में अभी कोई ठोस सबूत नहीं। कुछ देश इसे चीज की साजिश मानते हैं। इस वायरस को लेकर दुनिया के अलग-अलग लोगों के अलग ख्याल है। WHO इस वायरस की मूल उत्पत्ति में कारणों का पता लगाने में लगा हुआ है। 2020 में दुनिया सबसे बड़ी घटनाओं में यह महामारी सबसे बड़ी घटना है।
जिसने लोगो के रहन-सहन,खान-पान, व्यवहार, सोचने समझने की क्षमता को बहुत हद तक प्रभावित किया। लोग अपने घरों में कैद रहने को मजबूर हुए। लोग इस महामारी की वजह से करोड़ों लोगों के रोजगार छिन गया। तरकरीबन हर उम्र के व्यक्ति को मानसिक प्रताड़ना सहनी पड़ रही है। दुनिया मे बही भी लगभग सभी स्कूल और कॉलेज बन्द है। स्कूल कालेज न खुलने की मानसिक रूप से परेशान बच्चों के सुसाइड करने की घटनाएं आम हो गई है। कोरोना वायरस आने के बाद पूरी में घरेलू हिंसा में वृद्धि देखी गई है। अब साल के खत्म होने के साथ ही दुनिया भर के लोग इस महामारी के खत्म होने की आशा कर रहे हैं।
अमेरिका और ईरान युद्ध के लिए आमने-सामने
नए साल 2020 की का अभी तीसरा दिन हुआ था। दुनिया अभी कोरोना वायरस से को लेकर आने वाली तरह-तरह की खबरों से डरी हुई थी कि अमेरिका द्वारा 3 जनवरी 2020 को इराक के बगदाद शहर एक ड्रोन के द्वारा ईरान के सुप्रीम कमांडर कासिम सुलेमानी को मार गिराया। 17 मार्च 1957 को ईरान के दक्षिण-पश्चिम प्रान्त के किरमान में सुलेमानी का जन्म हुआ था।
कासिम बचपन में बहुत गरीब थे। कासिम सुलेमानी ने अपने सैन्य कैरियर की शुरुआत 1980 के ईरान-इराक युद्ध से शुरू किया। सुलेमानी का नाम चर्चा में तब आया जब 2014-2015 में उनके द्वारा आईएसआईएस (ISIS) के खिलाफ लड़ाई में कुर्द फ़ोर्स के सफल नेतृत्व के बाद आया। अपनी मौत तक सुलेमानी ईरान के रेवोल्यूशनरी गार्ड के अंतर्गत आने वाली विदेशी यूनिट कुर्द फोर्स के प्रमुख थे।
जो ईरान को विदेश में होने वाली सैन्य कार्रवाही में ईरान सरकार का साथ देता था।जो सीधे ईरान के सुप्रीम लीडर आयातुल्ला अली ख़ामेनई को रिपोर्ट करती है। कासिम सुलेमानी को ईरान का दूसरा सबसे ताकतवर शख्स जाता था।कासिम की मौत के बाद ईरान और अमेरिका में युद्ध जैसे हालात बन गए थे। अमेरिका का बड़े पैमाने विरोध हो रहा था ईरान में ईरान की जनता सड़को पर उतर आयी। ईरान ने अपनी मिसाइल अमेरिकी दूतावासों की ओर तैनात कर दी।
बगदाद में अमेरिकी दूतावास पर प्रदर्शनकारियों ने हमला कर दिया। इस हमले के लिए अमेरिका ने ईरान पर आरोप लगाया। मामला तब थोड़ा शान्त हुआ जब ईरान ने अमेरिकी सैन्य ठिकानों पर हमला करने का दावा किया और 80 अमेरिकी सैनकों के मार गिराने का दावा किया। इस बीच ईरान ने अपने यात्री विमान को ही मार गिराया था जिससे ईरान की दुनिया भर में किरकिरी हुई।
आर्मेनिया और अजरबैजान के बीच छिड़ी जंग
जहाँ एक तरफ दुनिया कोरोना महामारी से लड़ रही है और दूसरी तरफ यूरोप के दो देश ईसाई बहुल देश आर्मेनिया और मुस्लिम बहुल देश अजरबैजान के बीच दशकों पुराने विवाद ने जंग का रूप ले लिया। इस युद्ध के होने का कारण 4 दशक पुराना है।
बात 1980 की है जब सोवियत संघ का विघटन हुआ तो नागोर्नो-करबख जो ईसाई बहुल क्षेत्र था जिसे सोवियत संघ ने आर्मेनिया को दे दिया जो पहले अजरबैजान का हिस्सा था और यहीं से विवाद शुरू हो गया। जब से लेकर आज के समय में इन दोनों देशों के बीच इस क्षेत्र को लेकर कई बार युद्ध हो चुका है जिसका कोई निर्णय नहीं निकल पाया।
यह युद्ध तकरीबन 2 महीने चला और 2 महीने बाद रूस के हस्तक्षेप से युद्धविराम की घोषणा आर्मेनिया के नागोर्नो-करबख के क्षेत्र के खाली करने की शर्त पर हुआ। युद्ध से केवल हानि होती है। इस युद्ध मे कम से कम 2000 लोगों के मारे जाने की खबर है और हजारों लोग घायल हुए है। जिसमें सैनिक और आम आदमी भी हैं।
इस युद्ध मे आर्मेनिया को काफी नुसकान इसमें उसके 185 टैंक, 44 इन्फेंट्री ,147 आर्टिलरी गन, 72 राकेट लॉन्चर्स 12 रडार इसके जान-माल का भारी मात्रा में नुसकान उठाना पड़ा। अजरबैजान के युद्ध जीतने में तुर्की और इजरायल का बहुत बड़ा हाथ रहा तुर्की ने अजरबैजान की सहायता के लिए अपने सैन्य उपकरण के अलावा अपने लड़ाके भी भेजे। इजरायल के ड्रोन अजरबैजान के लिए बहुत कारगर रहा। इस युद्ध में अजरबैजान को भी काफी नुसकान उठाना पड़ा।
अमेरिका में जब लाखों लोग सड़कों पर उतरे-
जब अमेरिका में कोरोना के प्रतिदिन लगभग 1 लाख के करीब केस आ रहे थे और प्रतिदिन 2 से 3 हजार लोगों की मौत हो रही थी। एक तरफ पूरा अमेरिका सड़कों पर उतर आया था 2020 की सबसे बड़ी घटनाओं में से एक अमेरिका में हुए विरोध प्रदर्शनों को अलग नहीं किया जा सकता।
जब एक अमेरिकी अश्वेत 46 वर्षीय जार्ज फ्लॉयड की मौत पुलिस हिरासत में हो जाती है और इस घटना का वीडियो वायरल हो जाता है। जिसमें पुलिस उसकी गर्दन को दबाए हुए हैं। वो इसे छोड़ने के लिये कहता है उसे सांस की बीमारी होती है और इस कारण उसकी मौत हो जाती है।
इसके बाद पूरा अमेरिका गुस्से से उबल पड़ा। लाखों लोग सड़कों पर उतर आते हैं और जार्ज फ्लॉयड के लिये न्याय की मांग करने लगे। विरोध प्रदर्शनों के दौरान पुलिस और लोगों के बीच झड़प भी हुई जिसमें कई लोगों को अपनी जान से हाथ धोना पड़ा।
इन सब के बीच अमेरिकी सरकार को मोर्चा संभालने सेना बुलानी पड़ती है। न्यूज एजेंसी एपी के अनुसार वाशिंगटन के व्हाइट हाउस के बाहर सैकड़ों प्रदर्शन करने लगे तो राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप को बंकर में जाना पड़ा। अमेरिका के सभी राज्यों में बहुत बड़े पैमाने पर विरोध देखने को मिला। यह विरोध काफी दिनों तक चला। इस घटना को लेकर यूरोप के देशों में भी काफी विरोध देखने को मिला। एक बात पर गौर किया जा सकता है कि अमेरिका में डोनाल्ड ट्रंप के राष्ट्रपति बनने के बाद से ही अमेरिका में सफेद रंग या फिर नस्ली भेदभाव का पुनरुत्थान होता दिखता है।
संयुक्त राष्ट्र की एक रिपोर्ट के मुताबिक अमेरिकी कानून प्रवर्तन अधिकारियों के द्वारा अफ्रीकी अमेरिकियों मरने और उनके साथ दुर्व्यवहार उनका शोषण करने की गंभीर हालत है। अश्वेतों को कैद किए जाने की संख्या श्वेतों से 5.9 गुना अधिक है। इस बात से पता लगाया जा सकता है कि अमेरिका में अश्वेतों का किस प्रकार शोषण किया जा रहा है।
अमेरिका में बदलती सत्ता तथा दुनिया पर पड़ने वाला प्रभाव-
डोनाल्ड ट्रंप को हराकर अमेरिका के 46वें राष्ट्रपति निर्वाचित होने वाले बिडेन के जीतने के बाद अमेरिका का प्रभाव दुनिया पर तथा भारत पर किस प्रकार पड़ेगा। बिडेन के क्या मायने है और यह 2020 में घटित होने वाली प्रमुख घटनाओं में कितना महत्व है। ऐसा पहली बार था जब अमेरिका में 16 करोड़ से ज्यादा लोगों ने वोट डाला। जिसमें से साढ़े सात करोड़ वोट सिर्फ जो बिडेन को मिला। इनका राजनैतिक करियर पांच दशक से भी ज्यादा पुराना है, यह वर्ष 1973 में पहली बार अमेरिका के सांसद बने थे ।
20 नवंबर 1942 को जो बिडेन का जन्म पेंसिलवेनिया में हुआ था जो बिडेन 25 वर्ष की उम्र में राजनीति में आए थे। लेकिन एक भयानक दुर्घटना में उन्होंने अपनी पत्नी और 13 महीने की बेटी को खो दिया लेकिन उसके बाद भी उन्होंने सीनेट का चुनाव लड़ा और जीता भी। वर्ष 2007 में एक बार फिर अमेरिका के राष्ट्रपति बनने में दौड़ शामिल हुए पर , उन्होंने अपनी उम्मीदवारी वापस ले ली।
उपराष्ट्रपति के तौर पर व्हाइट हॉउस में पहुचे। हालांकि जो बिडेन पर कई बार आरोप भी लगे है जिनमें सबसे बड़ा आरोप इराक युद्ध था। 2002 के इराक के युद्ध के समर्थन में वोट दिया था जिसे बाद में इसे अपनी बड़ी गलती मानी थी। 1978 में उन्होंने एक विवादित कानून का समर्थन भी किया था और उन पर रंग भेदी होने के भी आरोप लगे। बिडेन के राष्ट्रपति बनने से दुनिया कुछ बड़े बदलाव भी देखने को मिल सकते है बहुत पुराने समय से ही अमेरिका को विश्व का नेता माना जा रहा है शायद ही ऐसा कोई बड़ा आंतरिक मामला हो जिसने अमेरिका ने हस्तक्षेप नहीं किया हो।
इससे पहले के राष्ट्रपतियों का अन्य देशों के आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप के आरोप लगते रहे है चाहे वह पहली बार 2008 में बने राष्ट्रपति बराक ओबामा हो इन पर भी पूरी दुनिया में दखलअंदाजी करने का आरोप लगा थे चाहें वह जॉर्ज बुश हो उन पर भी अफगानिस्तान जैसे देशों के साथ युद्ध शुरू करने तथा इस्लामिक देशों में जबरदस्ती घुसने के आरोप लगे इसीलिए जब ओबामा दोबारा राष्ट्रपति बने तो अमेरिका ने इस दखलअंदाजी को थोड़ा कम किया लेकिन पर्दे के पीछे से राष्ट्रपति का नियंत्रण जो बिडेन के हाथ में था डोनाल्ड ट्रंप ने आने के बाद दुनिया की परवाह करना छोड़ दिया तथा महान बनने के लालच में अपने देश को मोटे तौर पर दुनिया से अलग-थलग कर दिया था।
उन्होंने कई आंतरिक संगठन से अमेरिका को बाहर निकाल लिया और शरणार्थी और प्रवासियों के लिए अमेरिका के दरवाजे लगभग बंद ही कर दिए। लेकिन बिडेन के अनुसार अमेरिका एक बार फिर आंतरिक मुद्दों पर दुनिया का नेतृत्व करेगा। साथ ही साथ इमीग्रेशन एच वन वी विजा के मुद्दे पर भी बिडेन साफ्ट रुख अपना सकते हैं ट्रम्प शासन के दौरान प्रवासी के लिए वीजा हासिल करना तथा नागरिकता करना बहुत मुश्किल हो गया था ।
बिडेन इस प्रक्रिया को थोड़ा आसान बना सकते हैं आतंकवाद को भी लेकर बिडेन सख्त रुख अपना सकते हैं परंतु चीन के साथ बातचीत संभल कर चलेंगे डोनाल्ड ट्रंप चीन और भारत की सीमा विवाद को लेकर भारत का खुलकर समर्थन करते थे परंतु बिडेन के बारे में कुछ कह पाना बहुत मुश्किल है हालांकि वह भारत के साथ मजबूत संबंधों के पक्षधर रहे हैं।
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