गत दिवस को एसईसीएल हॉस्पिटल कोरिया मनेन्द्रगढ़ में संचालित रीजनल हॉस्पिटल एवं आमाखेरवा स्थित मेडिकल स्टोर्स में शिकायत अनुसार, कलेक्टर कोरिया कुलदीप शर्मा के निर्देशन में जिला, ब्लॉक स्तरीय स्वास्थ्य विभाग, ड्रग डिपार्टमेंट के अधिकारियों के द्वारा सम्बन्धित अस्पताल नर्सिंग होम एक्ट,बीएमडब्ल्यू/एनजीटी, फायर सेफ्टी, ड्रग एन्ड कॉस्मेटिक एक्ट के तहत आमाखेरवा स्थित मेडिकल स्टोर क्रमश मनीष मेडिकल स्टोर्स, शिव मेडिकोज, एवम प्रमोद मेडिकल स्टोर्स आमाखेरवा का निरीक्षण किया गया तथा क्वालिटी परीक्षण हेतु औषधियों का नमूना लिया गया । निरीक्षण के दौरान बीएमओ मनेन्द्रगढ़ डॉ सुरेश तिवारी, जिला सलाहकार डॉ प्रिंस जायसवाल, ड्रग कंट्रोलर संजय नेताम, ड्रग इंस्पेक्टर विकास लकड़ा,तहसीलदार श्रीकांत पांडेय मौजूद थे ।
दूसरी ओर जिला मुख्यालय बैकुन्ठपुर में डॉक्टर जेनेरिक दवा के बजाय ब्रांडेड दवा लिख रहे हैं। बड़ा सवाल है, डॉक्टर आखिर क्यों जेनेरिक दवा नहीं लिखना चाहते? जानकार बतो हैं कि इसके मुख्य कारण दवा कंपनियों से मिलने वाला फायदा, जेनेरिक दवाओं को लेकर सरकार की पुख्ता पॉलिसी नहीं होना और दवाओं की गुणवत्ता को लेकर संदेह हैं। हालांकि सरकार द्वारा इस ओर किए गए प्रयासों को भी डॉक्टर्स का समर्थन नहीं मिल रहा है।
केंद्र सरकार के निर्देश पर मेडिकल काउंसिल ऑफ इंडिया (एमसीआई) ब्रांडेड दवा के स्थान पर दवा का रसायन (साल्ट या मॉलिक्यूल) लिखने का सर्कुलर डॉक्टरों को जारी कर चुकी है। इंडियन मेडिकल एसोसिएशन (आइएमए) इस संबंध में सदस्यों को साल्ट लिखने के निर्देश दे चुकी है। हालांकि इसमें कहा गया है, साल्ट के साथ अपनी राय के रूप में ब्रांड का नाम दे सकता है, लेकिन एक्का दूक्का डॉक्टर ही ब्रांड की जगह साल्ट लिख रहे हैं।
एमआर से सांठगॉठ करते हैं डाक्टर
सरकार ने घोषणा तो की, लेकिन ठोस पॉलिसी नहीं बनाई, जिसे इम्प्लीमेंट किया जा सके। 95 फीसदी डॉक्टर्स मरीजों को जेनेरिक दवाएं नहीं लिखते, इनमें से भी अधिकतर पीजी कंपनियों की लिखते हैं। डॉक्टर्स और ब्रांडेड दवाइयां बना रही मल्टीनेशनल कंपनियों की मिलीभगत का काम एमआर करते हैं, वहीं पीजी कंपनियों के लोग सीधे दवाएं बाजार में फैलाते हैं। इन पर नियंत्रण के लिए अलग मजबूत एजेंसी नहीं है। जितना खर्च ब्रांडेड और पीजी कंपनियां अपनी दवाओं के प्रचार पर करती हैं, उसका एक प्रतिशत भी जेनेरिक दवाओं के प्रचार पर खर्च नहीं होता।
ब्रांडेड जेनेरिक और जेनेरिक का बाजार
ब्रांडेड जेनेरिक रू मल्टीनेशनल या नेशनल कंपनियों को जेनेरिक डिवीजन बनाना जरूरी है। उनकी ब्रांडेड और जेनेरिक दवा की एमआरपी एक होती है। जेनेरिक दवा पर 70 से 80 फीसदी डिस्काउंट मिलता है। यह दवाएं होलसेल व एजेंसी के माध्यम से बाजार में पहुंचती हैं। जेनेरिक दवा बनाने का अधिकतर काम हिमाचलप्रदेश और हैदराबाद की फैक्ट्रियों में होता है। कंपनियां ऑर्डर देकर दवाएं बनवाती हैं। ये रसायन व उर्वरक मंत्रालय के साथ डब्ल्यूएचओ के मापदंडों का पालन करती हैं। जेनेरिक दवा के फॉर्मूलेशन पर पेटेंट हो सकता है, लेकिन मटेरियल पर नहीं ।
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