तहकीकात न्यूज @ वेब डेस्क . बैकुन्ठपुर
कोरिया जिले के सबसे प्राचीन एवं धार्मिक स्थलों में एक कैलाशपुर के ओमकारेश्वर धाम में तीन दिवसीय मेले का समापन गुरुवार को हुआ । जिसमें जिले एवं आसपास के श्रद्धालुओं ने 3 दिनों तक त्रिवेणी संगम घाट पर स्नान कर भगवान से सुख समृद्धि और परिवार की कुशलता की कामना की । इस दौरान आयोजक मंडल के वरिष्ठ सदस्य बालिमक दुबे ने बताया कि इस वर्ष कोरोना को देखते हुए कई आयोजनो को स्थगित कर दिया गया। इसयके बावजूद ओमकारेश्वर धाम में जिले एवं दूसरे जिलों से कई दलों द्वारा धार्मिक गीतो की ष्षानदार प्रस्तुति दी गई । मेले के तीनो दिनो तक इस स्थान पर भोज व भंडारे का आयोजन किया गया।
5 दषको से अनेदेखी का षिकार
गौरतलब हो कि विगत पांच दशकों से लगातार ओमकारेश्वर में मेले का आयोजन किया जा रहा है किंतु जिला प्रशासन की अनदेखी के कारण इस तीर्थ स्थान को अब तक वह दर्जा नहीं मिल पाया है। विदित हो कि हसदो, घुनघुटा व वनखेता नदी के संगम पर ओंकारेश्वर धाम की यहा के लोगो की आस्था और विश्वास का केन्द्र बना हुआ है। जहां बड़ी संख्या में कोरिया जिले के अलावा पड़ोस के सूरजपुर जिले से श्रद्धालु आस्था की डुबकी लगाने पहुंचेते हैं। इस दौरान कार्यक्रम स्थल पर विलुप्त हो रही लोकगीत एवं लोकनृत्य प्रतियोगिता का आयोजन होता रहा है।
यह है इतिहास
ओमकारेश्वर तीर्थ स्थल की पहचान के संबंध में कैलाशपुर वनस्थली के अध्यक्ष बाल्मिक दुबे बताते हैं कि ओमकारेश्वर तीर्थ के समान ही कैलाशपुर का ओमकारेश्वर है जहां पर तीन नदियों का संगम है जिसमें हसदो, घुनघुटटा व वनखेट़ा नदी के तट पर 500 वर्ष पूर्व प्राचीन शिवालय स्थित है। जहां पर एक प्राचीन शिव मंदिर का भग्नावशेष भी मौजूद है। और इसी को आधार मानकर यहां पर एक नए मंदिर का निर्माण भी कराया गया है ।
विगत 18 वर्षो से मेले का आयोजन
मकर संक्रांति के अवसर पर पिछले 18 वर्षों से लगातार यहाॅ मेले का आयोजन हो रहा है । मेले का आयोजन वर्ष 2001 में छत्तीसगढ़ के पूर्व वित्त मंत्री स्वर्गीय रामचंद्र सिंह देव के द्वारा मेले की शुरुआत की गई थी। जिसमें उस समय के जिला पंचायत अध्यक्ष यवत कुमार सिंह के अलावा जिले के कलेक्टर विकासशील की महत्वपूर्ण भूमिका थी । किंतु बीते काफी सालों से आस्था का यह केंद्र प्रशासन की निगाह से अछूता ही रहा । यहां पर जन सहयोग के माध्यम से ही मेले का आयोजन किया जा रहा है ।
बाबा के दर पर सबकी भरती है झोली
मंदिर की प्रसिद्धि के संबंध में बताते हुए बाल्मीकि दुबे बताते हैं कि इस मंदिर की मान्यता पूरे क्षेत्र में इसलिए मशहूर है कि यहां पर लोगों की मन्नत कभी खाली नहीं जाती । इस दौरान बाल्मीकि दुबे कहते हैं कि 2 जिले को आने वाले श्रद्धालुओं में शिव भक्त यहां पहुंचकर पहले संगम में डुबकी लगाते हैं इसके उपरांत सूर्य पूजन फिर भगवान शिव की पूजा करते हैं । कुछ लोग की मन्नत पूरी हो जाने के बाद यहां मेला के अवसर पर ही भंडार एवं भोज का आयोजन भी किया जाता है वहीं दूसरी ओर विलुप्त हो रही लोकगीत एवं लोकनृत्य को प्रतियोगिता करा कर संक्रांति आयोजन को धार्मिक के अलावा सांस्कृतिक पहचान भी देने का प्रयास किया गया है । जानकारी देते हुए बताया गया कि भारत में दूसरा स्थल है जहां पर ओम की आकृति नदियों द्वारा प्राकृतिक रूप से बनी हुई है । जिस स्थान ओमकारेश्वर में स्थित है और यही कारण है कि ओम की आकृति होने के कारण ही इसका नाम ओमकारेश्वर पड़ा है।
ज्यदातर लोगो ने 15को मनाई संक्राति
जिलेभर में बुद्धवार को मकर संक्रांति श्रद्धा, उल्लास और पंरपरा के अनुसार मनाया जा रहा है। हालांकि, कई जगह इस मंगलवार भी मनाया गया। देश के अलग-अलग हिस्सों में इस अलग-अलग नामों से जानते हैं। सूर्य भगवान को समर्पित इस त्योहार पर लोग नदियों में पवित्र स्नान करते हैं। मकर संक्रांति पर स्नान, दान के साथ भगवान सूर्य की पूजा का विशेष महत्व होता है। पंरपराओं के अनुसार मकर संक्राति से सूर्य उत्तरायण होता है और मकर राशि में प्रवेश करता है। इसी के साथ ही एक महीने से चला आ रहा खरमास का समाप्त होगा और शादी-विवाह समेत मांगलिक कार्य शुरू हो जायेगें।
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