दोनो निकायो में कई वार्डों में बुरे फंसे दिग्गज, कैरियर दॉव पर……..

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Baikunthpur @ Tahkikat News

कोरिया जिला मुख्यालय बैकुन्ठपुर और षिवपुर-चरचा नगर पालिका में चुनाव प्रचार पूरे उफान पर है। चुनाव प्रचार के साथ प्रत्याशियों के दिल की धड़कन भी तेज होती जा रही है। ऐसे कई वार्ड हैं जहां कांग्रेस व भाजपा के दिग्गज फंसते हुए नजर आ रहे हैं। मतदाताओं की खामोशी ने दोनों दलों की नींद उड़ा दी है। बताया जा रहा है कि चुनाव के पहले वास्तविक स्थिति का आंकलन कराने का मौका नही मिला। हालांकि कांग्रेस संगठन को यह बात भली भांती पता थी कि आम लोगो का मुड उनके खिलाफ है। जबकि भाजपा कांग्रेस के प्रति जनता के स्वाभाविक रोष पर अपनी राजनितिक रोटियॉ सेंकने के फिराक में थी। वही पर दोनो प्रमुख दलो के द्धारा अब कौन-कौन सा वार्ड हारने या जीतने की स्थिति में है, इसका आंकलन किया जा रहा है। प्रत्याशी एक-एक मत के लिए जी जान लगा रहे हैं। सुबह से लेकर रात तक घर घर जनसंपर्क में लगे हुए हैं।

दिग्गजो की कैरियर दॉव पर

बैकुन्ठपुर और षिवपुर-चरचा में पालिका में अध्यक्ष बनने के लिए कई दिग्गज पार्षद चुनाव लड़ रहे हैं। जिस तरह से इन्होंने अपने लिए पहले से वार्ड चयनित कर लिया था तथा पूरे आत्मविश्वास में थे कि वे यहां से चुनाव जीत जाएंगे, अब ऐसे दिग्गज फंसते नजर आ रहे हैं। बैकुन्ठपुर और षिवपुर-चरचा में भाजपा के कई दिग्गज बुरी तरह से फंस चुके हैं। कहीं निर्दलीय उनका समीकरण बिगाड़ रहे हैं, तो कहीं सीधी टक्कर में वे पिछड़ते नजर आ रहे हैं। कई वार्डो में कांग्रेस व भाजपा के दोनों दलों के दिग्गजों का खेल बिगड़ता जा रहा है। जो वार्ड इन्हें आसान लग रहा था, अब वहीं वार्ड उनके लिए कठिन होता जा रहा है। सभी जगह ऐसे कई वार्ड है, जहां निर्दलीय प्रत्याशी भाजपा और कांग्रेस से आगे चल रहे हैं। कई वार्डों में जीतने की स्थिति में है तो कहीं भाजपा का तो कहीं कांग्रेस का गणित बिगाड़ चुके हैं।

आम र्चचा से डरे दिग्गज

कई बड़े प्रत्याशियों के फंसने या चुनाव हारने की बाते बैकुन्ठपुर और षिवपुर चरचा में आम हो चली है। यही कारण हे कि इन दिग्गजो के पैर के नीचे से जमीन खिसकती नजर आ रही है। कहा जा रहा है कि यदि दिग्गज वार्ड का चुनाव हारे तो फिर किस मुह से वे आने वाले दिनो में अपनी पार्टी से बउे अिकअ की मांग करेंगें। जिन प्रत्याशियों पर दोनों दलों को भरोसा था, उन्हीं के पिछड़ने की खबर से पार्टियों में बेचौनी है। सर्वे के आधार पर दोनों दल अपनी पूरी ताकत वहां झोकेंगे।

चुनाव ने आटो वालो की खोली पोल

इस बार के निकाय चुनाव ने आटो चालकों की मनमानी की पोल भी खोल दी है। शहर में चलने वाले अधिकांश आटो का लंबे समय से बीमा नहीं है। आटो का बीमा न होने की बात भी निकाय चुनाव के दौरान ही सामने आई। जब प्रत्याशियों को प्रचार के लिए गाड़ियों की जरूरत पड़ी और चुनाव आयोग का निर्देश था कि जिन वाहन के पूरे दस्तावेज सही होंगे। उन्हें ही प्रचार में संलग्न करने की अनुमति होगी। खास बात यह है कि इस ओर प्रशासन का भी कोई ध्यान नहीं है। इसलिए आटो में सफर करने वाले सावधान हो जाएं। क्योंकि हादसा होने की स्थिति में उनका और उनके परिवार का भगवान ही मालिक होगा। क्योंकि बीमा न होने से उन्हें तो कोई क्षतिपूर्ति राशि नहीं मिलने वाली है। बताया जा रहा है कि शहर में चल रहे रीब 80 से 90 फीसद आटो का बीमा नहीं है। इसके अलावा कई आटो चालक बिना लाइसेंस के ही गाड़ी चला रहे हैं।

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