स्मार्टकार्ड इंसेंटिव घोटाले की रायगढ में जॉच शुरु, शिकायतकर्ता जॉच के तरिके सेे नाराज

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जॉच टिम पर एमसीबी जिले के तरह लिपा-पोती कर मामले को निबटाये का आरोप

सुबे का निजाम बदल गया पर पिछली सरकार में खुलेआम और बेखौफ होकर अधिकारियो के द्धारा भ्रष्टाचार को संरक्षण देने का दौर समाप्त होता नही दिख रहा है। प्रदेश भर किये गये स्मार्ट कार्ड घोटले में रायगढ जिले में चल रही जॉच से मामले के शिकायतकर्ता बेहद नाराज बताये जा रहे हैं। शिकायतकर्ता का कहना है कि रायपुर से आये जाच दल का कार्य संदेहास्पद लग रहा है । जिस प्रकार से लोगो के बयाना लिये गये हैं मामले को दबाने का प्रयास साफ नजर आ रहा है। गौरतलब हो कि एैसे ही जॉच दल के द्धारा एमसीबी जिले के खडगवा में हुए स्मार्टकार्ड की जाच कर जाच दले ने 86 लाख से अधिक लाभ गलत तरिके से लेने के मामले को मात्र 5 लाख का पेनल्टी कर सभी 9 आरोपियो को दोष मुक्त कर दिया गया । जबकि एमसीबी में हुए घोटाले की जाच दल पर भी जानकार सवाल खडा कर रहे हैं। पुरे मामले में सरकार को अभी भी 80 लाख से अधिक की चपत लगाने की भरपाई अधूरी है।


दूसरी ओर रायगढ जिला अस्पताल और मेडिकल कॉलेज में डॉ. खूबचंद बघेल स्वास्थ्य सहायता योजना के सालाना इंसेंटिव को लेकर कोहराम मचा हुआ है। रायगढ में मामले को गंभीरता से लेते हुए घोटाले में घिरते देख बड़े डॉक्टर्स ने चार डाटा इंट्री ऑपरेटर्स को निलंबित कर दिया है, बढ़ते विवाद के बाद राज्य शासन ने संज्ञान लेते हुए 3 सदस्यों की टीम गठित कर जांच के लिए रायगढ़ भेजा जहां उक्त अधिकारी ने जांच पड़ताल सभी पक्ष का बयान भी दर्ज किए हैं।
सोमवार को रायपुर से तीन सदस्यीय टीम जिला अस्पताल इंसेटिव घोटाले की जांच के लिए पहुंची। वहॉ पर भी मामले में हो रही जांच से शिकायतकर्ता असंतुष्ट बताये जा रहे हैं। क्योंकि जिन लोगों पर इंसेटिव घोटाले की जांच का आरोप है उन्हीं के सामने जांच टीम ने बयान लिया और आमने-सामने सवाल-जवाब भी किया। जिला स्तरीय टीम पर भी आरोप है कि वह इस पूरे मामले को रफा-दफा करने में लगी है तभी तो उसने बेगुनाह 4 डाटा इंट्री ऑपरेटर्स को बलि का बकरा बनाते हुए निलंबित कर दिया।

रायपुर से आई जांच समिति में एक डॉक्टर, एक एकाउंट विभाग से और एक नोडल अधिकारी आयुष्मान योजना के है। जबकि जिला स्तरीय जांच टीम डॉ. भानू पटेल, एकाउंट ऑफिसर, जिला कार्यक्रम प्रबंधक औऱ सीएस डॉ. आरएन मंडावी समेत पांच लोग हैं। रायपुर की टीम ने एक-एक कर पीड़ितों को बुलाया और कथित आरोपी प्रोग्राम मैनेजर मनीष नायक और आयुष्मान योजन के जिला नोडल अधिकार तिलेश दीवान के सामने ही बयान दर्ज कराया गया। । कई मौकों पर दोनों की पीड़ितों से बहसाबहसी भी हुई पर इससे जांच दल को कोई फर्क नहीं पड़ा। फिलहाल जांच दल जांच रिपोर्ट बनाकर शासन के पास प्रेषित करने की बात कह रही है।


सीएमएचओ कार्यालय रायगढ पर मनमानी का स्टाफ ने आरोप लगाया है। जिला अस्पताल में कितने केस आए इसकी जानकारी नहीं। कितने केस और किस आधार पर बंटे कोई जानकारी नहीं है। शिकायतकर्ता ने बताया कि सिविल सर्जन के 4,051 केस पर 31 हजार रूपये का भुगतान किया गया है तो वहीं जतन केंद्र के संविदा में रखे गए प्रोग्राम एसोसिएट को 3,969 केस पर 2 लाख 92 हजार का भुगतान। प्रोग्राम एसोसिएट न तो किसी का मरीज इलाज करते हैं और न ही किसी भी प्रकार की चिकित्सकीय सहायता। अगर संस्था प्रमुख के हिस्से 0.5 प्रतिशत की दर देखें तो इस हिसाब उनका भी हिस्सा सिविल सर्जन के बराबर होता न कि उनसे करीब 10 गुना अधिक। नर्स अर्थात सिस्टर्स में भी काफी रार मचा हुआ है। उनका आरोप है कि एक सिस्टर को 3467 केस पर 2 लाख 48 हजार यानी 71 रूपये प्रति केस तो दूसरे को 1021 केस पर 4121 रूपये अदा किये गए हैं यानी 4 रूपये प्रति केस। ऐसे कई सिस्टर्स के केस हैं जहां अनियमितता है। कुल मिलाकर इंसेंटिव बांटने में मुख्य चिकित्सा एवं स्वास्थ्य विभाग के अधिकारियों नें अपनी मनमानी चलाई है।

घोटोले में इंसेटिव राशि किसी सिस्टर को 100 केस तो किसी को 3800 केस तक दिया गया है और प्रति केस रूपयों के आबंटन में बंदरबाट दिख रहा है। जैसे किसी को 4 रूपये प्रति केस किसी को 80 रूपये से अधिक प्रति केस दिये गए हैं। एक नर्स का सालाना इंसेंटिव मात्र 8 रुपया ही आया है। वहीं नेत्र विभाग के डॉक्टर का इंसेंटिव 12 लाख 69 हजार आता है पर उनके विभाग के दो नर्स का इंसेंटिव नहीं आया। स्टाफ डॉक्टर्स ने गंभीर आरोप लगाते हुए कहा कि सामान्य ड्यूटी वाले डॉक्टर्स के साथ भेदभाव हुआ है पर कैजुएल्टी में तो आया को नर्स से अधिक इनसेंटिव मिला है। डॉक्टर-सिस्टर जो हमेशा अपने समय से अधिक कैजुएल्टी में काम करते हैं उनके केस को कम किया और इनसेंटिव भी कम दिया गया है। पारदर्शी तरीके से प्रोत्साहन राशि का वितरण हो इसके लिए नियमावली बनी है पर यहां तो इसका पालन ही नहीं हुआ है।

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