मजदूर से मंत्री का सफर…….एसईसीएल ने दिया बैकुंठपुर विधायक भइयालाल राजवाड़े सर्वाेच्च श्रमिक सम्मान
मैंने 10 वर्षों तक खदान में बहाया है पसीना, मुझे गर्व है कि मैं चरचा का श्रमिक हूॅ-भइयालाल राजवाडे
बैकुंठपुर।
महाजन स्टेडियम में आयोजित अखिल भारतीय सेशन स्मृति गोल्ड कप फुटबॉल प्रतियोगिता के 50वें गोल्डन जुबली वर्ष के अवसर पर मुख्य अतिथि के रूप में पहुंचे बैकुंठपुर विधायक एवं पूर्व खेल व श्रम मंत्री भइयालाल राजवाड़े को एसईसीएल के सीएमडी हरिश दुहन द्वारा सर्वाेच्च श्रमिक सम्मान से सम्मानित किया गया। यह क्षण न केवल उनके लिए बल्कि समूचे चरचा क्षेत्र के लिए गर्व का अवसर बन गया।
भइयालाल राजवाड़े का जीवन संघर्ष, श्रम और सेवा की अद्भुत मिसाल है। वर्ष 1968 से 1978 तक उन्होंने चरचा कॉलरी की खदान में एक साधारण मजदूर के रूप में कार्य किया। वह दौर संसाधनों की भारी कमी का था। लोहे के सबल से कोयला तोड़ा जाता था और बांस की टोकरी में भरकर सिर पर रखकर कोयला बाहर निकाला जाता था। प्रतिदिन श्रमिक अपनी जान हथेली पर रखकर खदान के अंदर उतरते थे। सुरक्षा संसाधनों की बेहद कमी थी,उन्हीं कठिन परिस्थितियों में श्री राजवाड़े ने देश की ऊर्जा आपूर्ति के लिए कोयला उत्पादन में अपना पसीना बहाया।
10 वर्षो तक किया है एसईसीएल में किया मजदूरी
वर्ष 1978 से लेकर 1978 तक की अवधि 10 वर्षों तक मजदूर के रूप में कार्य करने के साथ-साथ उन्होंने समाज सेवा को भी अपना ध्येय बनाए रखा। वे आज भी सार्वजनिक मंचों पर गर्व से कहते हैं मैं चरचा कॉलरी का मजदूर रहा हूं और मुझे इस पर गर्व है। वर्ष 1978 में उन्होंने नौकरी छोड़कर राजनीति के माध्यम से जनसेवा का मार्ग चुना। सबसे पहले ग्राम पंचायत सरड़ी के सरपंच बने, फिर बैकुंठपुर जनपद सदस्य, जनपद अध्यक्ष, जिला पंचायत सदस्य, उपाध्यक्ष की जिम्मेदारी निभाते हुए वर्ष 2008 में पहली बार विधायक निर्वाचित हुए। इस कार्यकाल में उन्हें संसदीय सचिव बनाया गया। वर्ष 2013 में पुनः विधायक बनने के साथ ही उन्हें प्रदेश का खेल एवं श्रम कल्याण मंत्री बनाया गया। वर्ष 2023 में भी जीत दर्ज कर वे छत्तीसगढ़ के वरिष्ठ एवं प्रभावशाली विधायकों में शुमार हैं।
सहज, सरल और मिलनसार हैं भइयालाल
सहज, सरल और मिलनसार छवि के लिए पहचाने जाने वाले राजवाड़े ने कभी पक्ष-विपक्ष का भेदभाव नहीं किया। मंत्री रहते हुए उन्होंने असंख्य गंभीर रूप से बीमार मरीजों की सहायता की। प्रदेश में उन्हें “इलाज वाले बाबा” के नाम से भी जाना जाता है। उनका सरकारी बंगला हमेशा मरीजों और उनके परिजनों से भरा रहता था। इलाज के साथ आर्थिक सहयोग भी देते रहे, जिसके कारण उन पर निजी ऋण भी बढ़ा, लेकिन उन्होंने कभी इसकी परवाह नहीं की। खदान में मजदूर के रूप में प्राप्त अनुभव ने उन्हें गरीब और श्रमिक वर्ग की पीड़ा को गहराई से समझने की संवेदनशीलता दी। यही कारण है कि क्षेत्र की जनता उन्हें अपना मसीहा मानती है। महाजन स्टेडियम में मिला सर्वाेच्च श्रमिक सम्मान उनके उसी संघर्षपूर्ण, प्रेरणादायक और जनसेवा से भरे जीवन का सार्वजनिक अभिनंदन है। सच ही है मजदूर से मंत्री तक का यह सफर केवल पद परिवर्तन की कहानी नहीं, बल्कि श्रम, संघर्ष और सेवा की एक जीवंत गाथा है।

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