तहकीकात न्यूज @ वेब डेस्क . बैकुन्ठपुर
मेहनतकष आदिवासी परिवारों को अगर उचित मार्गदर्षन और सामान्य से ही संसाधन मिल जाए तो वह अपने आप प्रगति की राह बनाने लगते हैं। एैसा ही एक परिवार ग्राम पंचायत पिपरिया में रहने वाले आदिवासी समुदाय के श्री बु़द्धु सिंह का है। खरीफ की खेती के बाद महात्मा गांधी नरेगा के कार्यांे में अकुषल श्रम के लिए कतार में लगने वाले एक परिवार को डबरी का साधन मिल जाने से उनके जीवन जीने का तरीका ही बदल गया है। मनेन्द्रगढ़ जनपद पंचायत के अंतर्गत आने वाले ग्राम पंचायत पिपरिया में रहने वाले बुद्धु सिंह के सीमित परिवार को अब वर्ष के अन्य महीनों में रोजगार की कोई चिंता नहीं रही। मेहनतकष परिवार को एक छोटा सा जलसंचय का साधन मिलने के बाद यह परिवार अपने आर्थिक उन्नति की राह बनाने में व्यस्त हो गया है। आप अगर इनकी बाड़ी में जाकर देखें तो हर तरफ हरियाली है और सब्जी की अलग अलग फसलें लहलहा रही हैं। बुद्धु सिंह के पुत्र संपत अपने खेतों में धान की दोगुनी उपज लेने के बाद दो क्विंटल आलू और टमाटर लगाकर खुषहाली के रास्ते पर आगे बढ़ने लगे हैं। इस परिवार के लिए जलसंचय का एक साधन ही तरक्की की राह बनाने में मददगार साबित हो रहा है।

ग्राम पंचायत पिपरिया में रहने वाले बुद्धु सिंह की उम्र लगभग 60 बरस हो चुकी है। अ बवह उतने सक्षम नहीं रहे कि खेती किसानी में अपने बेटे का हाथ पूरी तरह से बंटा सकें परंतु उनके बेटे संपत के उत्साह में कोई कमी नहीं है। उसने हंसते हुए बताया कि अब सिंचाई का साधन बन गया है। इस बार गेंहू की फसल भी लगाने की तैयारी है। बुद्धु सिंह के परिवार में कुल चार सदस्य हैं। उनकी पत्नी मांनकुंवर और बेटे संपत के साथ उनकी बहू श्रीमती सुनीता साथ रहते हैं। इस आदिवासी परिवार के पास कुल आठ एकड़ जमीन है परंतु सारी असिंचित है। इनके घर के पास कुल चार एकड़ के आसपास भूमि है जिसमें खेत और बाड़ी हैं। गांव में दूसरे किसानों के अलावा अपने चाचा की जमीन पर डबरी और उससे होने वाले लाभ से प्रभावित होकर संपत ने ग्राम पंचायत में अपने खेतेां में भी डबरी बनाने की मांग रखी। ग्राम पंचायत के प्रस्ताव के आधार पर गत वित्तीय वर्ष में श्री बुद्धु सिंह आत्मज माधव सिंह के खेतों में डबरी बनाए जाने की प्रषासकीय स्वीकृति प्रदान की गई। इस कार्य की तकनीकी माप करने वाली यहां की तकनीकी सहायक श्रीमती अंजु रानी ने बताया कि इस कार्य के लिए कुल एक लाख अस्सी हजार रूपए की प्रषासकीय स्वीकृति सितंबर 2019 में प्राप्त हुई थी। जिसमें से लाकडाउन के दौरान एक लाख चैंसठ हजार रूपए का कार्य कराते हुए 930 मानव दिवस का अकुषल श्रम सृजित किया गया।
महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना के तहत स्वीकृत इस कार्य में बु़द्धु सिंह के परिवार ने पूरे वर्ष भर में मिलने वाला रोजगार भी प्राप्त किया और इससे उन्हे लगभग 18 हजार रूपए की मजदूरी भी प्राप्त हुई। इस पैसे से इस परिवार ने दो हार्सपावर का एक बिजली से चलने वाला पंप भी खरीद लिया है। संपत ने बताया कि इस बार अच्छी बारिष होने से पहली बरसात में ही भर गई। जिसका उपयोग धान का रोपा लगाते समय भी किया जिससे हमारी धान की दोहरी उपज हुई। संपत ने बताया कि पहले घर के पास के खेतों मंे 20 से 25 बोरी धान की फसल होती थी। अबकी बार 45 बोरी धान की फसल मिली है। धान की फसल के बाद घर की बाड़ी में एक क्विंटल आलू की फसल लगा ली है और साथ ही टमाटर और मिर्च की खेती भी कर रहे हैं। संपत के साथ उनकी पत्नी और मां भी खेती में हाथ बंटा रहे हैं। संपत ने बताया कि इंजीनियर मैडम के कहने से हमने पांच किलो मछली बीज भी डबरी में डाला है। अब लगभग एक पाव की मछलियां तैयार हो गई हैं। आने वाले गर्मियों में इसे बेचेंगे। श्री बु़़द्धु सिंह के खेतों में आकर यह सहज ही प्रतीत होता है कि एक छोटा सा जल संचय का संसाधन गरीब परिवार की आर्थिक खुषहाली में मददगार साबित होता दिख रहा है।
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