तहकीकात न्यूज @ वेब डेस्क . बैकुन्ठपुर
कार्तिक शुक्ल सप्तमी को सहस्त्रबाहु जयंती मनाई गई। है है क्षत्रिय कलचुरी समाज जिला कोरिया बैकुन्ठपुर द्वारा भगवान विष्णु के 24वें अवतार हैहयवंशीय राज राजेश्वर भगवान कार्तवीर्य सहस्त्रबाहु, अर्जुन जयंती आयोजित कलचुरी भवन बैकुन्ठपुर किया गया। इस सबंध में डॉ प्रिंस जायसवाल ने बताया कि भगवान विष्णु के 24वें अवतार माने गए हैं। हैहयवंशी क्षत्रियों में ये वंश सर्वश्रेष्ठ उच्च कुल का क्षत्रिय माना गया है। चन्द्र वंश के महाराजा कार्तवीर्य के पुत्र होने के कारण उन्हें कार्तवीर्य-अर्जुन कहा जाता है। उनका जन्म हैहयवंशी महाराज की 10वीं पीढ़ी में माता पद्मिनी के गर्भ से हुआ था। वे इतने वीर थे कि रावन को बंधक बनाकर उन्होंने अपने बच्चों को उससे खेलने के लिए दे दिया था।

उनका जन्म नाम एकवीर तथा सहस्रार्जुन भी है। वो भगवान दत्तात्रेय के भक्त थे और दत्तात्रेय की उपासना करने पर उन्हें सहस्र भुजाओं का वरदान मिला था। इसलिए उन्हें सहस्त्रबाहु अर्जुन के नाम से भी जाना जाता है। महाभारत, वेद ग्रंथों तथा कई पुराणों में सहस्त्रबाहु की कई कथाएं पाई जाती हैं। पौराणिक ग्रंथों एवं पुराणों के अनुसार कार्तवीर्य अर्जुन के व्याधिपति, सहस्रार्जुन, दषग्रीविजयी, सुदशेन, चक्रावतार, सप्तद्रवीपाधि, कृतवीर्यनंदन, राजेश्वर आदि कई नाम होने का वर्णन मिलता है।
सहस्रार्जुन जयंती क्षत्रिय धर्म की रक्षा एवं सामाजिक उत्थान के लिए मनाई जाती है। पुराणों के अनुसार प्रतिवर्ष सहस्त्रबाहु जयंती कार्तिक शुक्ल सप्तमी को दीपावली के ठीक बाद मनाई जाती है। भगवान सहस्त्रबाहु को वैसे तो सम्पूर्ण सनातनी हिन्दू समाज अपना आराध्य और पूज्य मानकर इनकी जयंती पर इनका पूजन अर्चन करता हैं किन्तु ये कलार समाज इस दिन को विशेष रूप से उत्सव-पर्व के रूप में मनाकर भगवान सहस्त्रबाहु की आराधना करता हैं।

भगवान सहस्त्रबाहु के विषय में शास्त्रों और पुराणों में अनेको कथाएं प्रचलित हैं किंवदंती हैं कि राजा सहस्त्रबाहु ने संकल्प लेकर शिव तपस्या प्रारंभ कीं थी एवं इस घोर तप के समय में वो प्रति दिन अपनी एक भुजा काटकर भगवान शिव जी को अर्पण करते थे। इस तपस्या के फलस्वरूप भगवान निलकंठ ने सहस्त्रबाहु को अनेको दिव्य चमत्कारिक और शक्तिशाली वरदान दिए थे। हरिवंश पुराण के अनुसार महर्षि वैशम्पायन ने राजा भारत को उनके पूर्वजों का वंश वृत्त बताते हुए कहा कि राजा ययाति का एक अत्यंत तेजस्वी और बलशाली पुत्र हुआ था ष्यदुष् के पांच पुत्र हुए जो 1-सहस्त्रदः,2-पयोद,3-क्रोस्टा,4-नील और 5-अंजिक इनमें से प्रथम पुत्र सहस्त्रद के परम धार्मिक 3 पुत्र हुये तथा वेनुहय नाम के हुए थे। महेश्वर नगर मध्यप्रदेश के खरगोन जिले में नर्मदा के किनारे स्थित हैं राजा सहस्त्रर्जुन या सहस्त्रबाहु जिन्होंने राजा रावण को पराजित कर उसका मान मर्दन कर दिया था । उन्होंने महेश्वर नगर की स्थापना कर इसे अपनी राजधानी शोषित किया था। यही प्राचीन नगर महेश्वर आज भी मध्यप्रदेश में शिव नगरी के नाम से भी जाना जाता हैं। अतीत में महान देवी अहिल्या बाईं होलकर की राजधानी भी रहा है।

वास्तुकला और स्थापत्य कला के उच्च मापदंडो के अनुसार निर्मित ये नगर अपने भव्य विशाल और तंत्र-यंत्र पुर्ण किन्तु कलात्मक शिव मंदिरों और मनोरम धाटो के लिए प्रसिद्ध हैं।
श्री जायसवाल ने बताया कि कलार शब्द का शव्दिक अर्थ है मृत्यु का शत्रु या काल का भी काल अर्थात कलार वंशीयो को बाद में काल का काल की उपाधि दीं जाने लगी जो शब्दिक रूप में बिगड़ते हुए काल का काल से कल्लाल हुई और फिर कलाल और अब कलार हो गई ज्ञातव्य है की भगवान शिव के कालातंक या मृत्युजय स्वरूप को बाद में अपभ्रश रूप में कलाल कहा जाने लगा। भगवान शिव के इसी चालातंक स्वरूप का अपभ्रश शब्द ही है कलवार, कलाल या कलार जैसे भगवान शंकर के नाम के पवित्र शब्द के शराब के व्यापारि के अर्थो या सामानेर्थी शब्द के रूप में प्रयोग कलार समाज के शराब के व्यवसाय के कारण उपयोग किया जाने लगा जो की अनुचित है। भगवान सहस्त्रबाहु के वंशज पुरातन या मध्यकालीन युग में कलचुरी इस देश के कई स्थानों के शासक रहे हैं और उन्होंने बड़ी ही बुद्धिमत्ता वीरता से न्याय प्रिय ढंग से शासन किया किन्तु आज भी ये कालांतर में बर्तन व्यवसाय करने लगे है।
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