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कोरिया जिला मुख्यालय बैकुन्ठपुर के गढेलपारा में चल रही श्री राम कथा के 6वे दिन कथा वाचिक दीपू जी महाराज के द्वारा भक्तों को श्री राम जन्म की कथा सुनाई। जिसको सुनकर भक्त भावविभोर हो गए। कथा में भक्तों को भगवान की कथा का वर्णन किया गया ।महाराज जी ने भगवान राम की सुंदर बाल लीलाओं का वर्णन करते हुए बता रहे हैं बचपन से ही लक्ष्मण जी की राम जी के चरणों में प्रीति थी। और भरत और शत्रुघ्न दोनों भाइयों में स्वामी और सेवक की जिस प्रीति की प्रशंसा है, वैसी प्रीति हो गई। वैसे तो चारों ही पुत्र शील, रूप और गुण के धाम हैं लेकिन सुख के समुद्र श्री रामचन्द्रजी सबसे अधिक हैं।
माँ कभी गोदी में लेकर भगवान को प्यार करती है। कभी सुंदर पालने में लिटाकर ‘प्यारे ललना!’ कहकर दुलार करती है, जो भगवान सर्वव्यापक, निरंजन (मायारहित), निर्गुण, विनोदरहित और अजन्मे ब्रह्म हैं, वो आज प्रेम और भक्ति के वश कौसल्याजी की गोद में (खेल रहे) हैं। भगवान के कान और गाल बहुत ही सुंदर हैं। ठोड़ी बहुत ही सुंदर है। दो-दो सुंदर दँतुलियाँ हैं, लाल-लाल होठ हैं। नासिका और तिलक के सौंदर्य का तो वर्णन ही कौन कर सकता है। जन्म से ही भगवान के बाल चिकने और घुँघराले हैं, जिनको माता ने बहुत प्रकार से बनाकर सँवार दिया है। शरीर पर पीली झँगुली पहनाई हुई है।
उनका घुटनों और हाथों के बल चलना बहुत ही प्यारा लगता है। उनके रूप का वर्णन वेद और शेषजी भी नहीं कर सकते। उसे वही जानता है, जिसने कभी स्वप्न में भी देखा हो। भगवान दशरथ-कौसल्या के अत्यन्त प्रेम के वश होकर पवित्र बाललीला करते हैं। इस प्रकार सबको सुख दे रहे हैं। इस प्रकार से प्रभु श्री रामचन्द्रजी ने बालक्रीड़ा की और समस्त नगर निवासियों को सुख दिया। कौसल्याजी कभी उन्हें गोद में लेकर हिलाती-डुलाती और कभी पालने में लिटाकर झुलाती थीं। एक बार मैया ने भगवान को स्नान करवाया है। फिर मैया ने सुंदर श्रृंगार किया है और प्रभु को पालने में सुला दिया है।
इसके बाद माँ ने अपने कुल के इष्टदेव भगवान की पूजा के लिए स्नान किया। फिर भगवान की पूजा की है और नैवेद्य (भोग) चढ़ाया है और मैया रसोई घर में गई है। फिर माता वहीं पूजा के स्थान में लौट आई और वहाँ आने पर राम को इष्टदेव भगवान के लिए चढ़ाए हुए नैवेद्य का भोजन करते देखा। माता अब डर गई है की मैंने तो लाला को पालने में सुलाया था पर यहां किसने लाकर बैठा दिया, इस बात से डरकर पुत्र के पास गई, तो वहाँ बालक को सोया हुआ देखा।
फिर पूजा स्थान में लौटकर देखा कि वही पुत्र वहाँ भोजन कर रहा है। उनके हृदय में कम्प होने लगा और मन को धीरज नहीं होता। हृदयँ कंप मन धीर न होई। माँ सोच रही है मैंने सच में 2 बालक देखे है या मेरी बुद्धि का भ्रम है। मुझे किस कारण से 2 बालक दिखाई दिए हैं। माँ बहुत घबराई हुई हैं। लेकिन भगवान मां को देख कर मुस्कुरा दिए हैं। फिर भगवान ने माँ को अपना अद्भुत रूप दिखाया है। कथा के समापन के अंततः श्रद्धालुओं को प्रसाद वितरण किया गया।
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