तहकीकात न्यूज @ वेब डेस्क . बैकुन्ठपुर
आरटीआई के तहत सूचना मांगने का अधिकार तो मिले 15 साल बाद वास्तविकता यह है कि विभागों से जानकारी मांगना छत्तीसगढ के कोरिया में गले की फांस बनता जा रहा है। इनके उत्पीड़न का मामले लगातार बढ़ रहे हैं। सूचना का अधिकार (आरटीआई) कानून के जरिए लोगों को किसी भी सरकारी विभाग से उससे संबंधित क्रियाकलापों के संबंध में अद्यतन जानकारी मांगने का अधिकार तो मिल गया। किंतु इसके साथ-साथ सूचना मांगने वालों को संबंधित अधिकारियों या कर्मचारियों का कोपभाजन भी बनना पड़ रहा है। जिले में लगतार ऐसे कई मामले सामने आए हैं जिसमें आरटीआई कार्यकर्ता के खिलाफ तरह-तरह के आरोप लगाते हुए मुकदमे दर्ज करा दिए गए। आम लोगो के लिए प्राथमिकी दर्ज कराना जहां टेढ़ी खीर है, वहीं सरकारी कर्मियो की तरफ से एफआइआर दर्ज करने में उदार रवैया अपनाती है। कोरिया जिले में सूचना के अधिकार अधिनियम 2005 के अंतर्गत जानकारी मांगने वालों को 6 साल तक जानकारी देने के लिए घुमाया जाता है।
जबकि इस दौरान शिकायत के उपरांत छत्तीसगढ़ राज्य सूचना आयोग रायपुर के द्वारा शिकायत पत्र क्रमांक सी 123/2019 में संबंधित जन सूचना अधिकारी को जानकारी देने के स्पष्ट निर्देश देने के 2 वर्ष बीत जाने के बावजूद भी जानकारी प्रदान नहीं की जा रही है। वहीं पर मामले में आवेदक जिल्दा निवासी रामप्रताप साहू का कहना है कि मैंने 2015 में राजस्व के एक मामले में खडगवा में आवेदन लगाया था जिसके उपरांत आज तक इसकी जानकारी के लिए मुझे घुमाया जा रहा है । इस दौरान उन्होंने कोरिया कलेक्टर से राज्य सूचना आयोग के निर्देश का पालन कराने के लिए पत्र लिख मांग किया है कि राज्य सूचना आयोग के आदेश के उपरांत आज दिनांक तक मुझे संबंधित मामले की जानकारी एवं क्षति पूर्ति दोनों में आयोग के आदेश का पालन नहीं कराया गया है । जबकि जन सूचना अधिकारी राजस्व चिरमिरी खंडगवा को उनके विरुद्ध सूचना के अधिकार अधिनियम की धारा 20-2 के तहत अनुषासनात्मक व अर्थदण्ड की कार्रवाई की अनुशंसा संभाग के संभाग आयुक्त के करने व राज्य सूचना आयोग के आदेश निर्देश का पालन नहीं होना अपने आप में जिले में सूचना के अधिकार कानून का माखौल की पूरी कहानी बयां करता है।
आरटीआई कार्यकर्ता को किया जाता है परेषान
पिछले डेढ दशक में जिले के सैकडो आरटीआई कार्यकर्ताओं के खिलाफ उगाही करने, एससी-एसटी एक्ट के तहत उत्पीड़न, धमकी देने या छेड़खानी जैसे मामले दर्ज कराए गए। सूचना मांगने वाले ये सभी लोग मुकदमेबाजी में उलझे हैं। वही पर लोगों अब राज्य सरकार व राज्य सूचना आयोग से न्याय की गुहार लगा रहे है। दरअसल लोक कल्याण से संबंधित सरकारी योजनाओं में अनियमितता या लापरवाही जैसी करतूत को छिपाने वाले अधिकारी या कर्मचारी आरटीआई कार्यकर्ताओं के खिलाफ प्रतिशोधात्मक कार्रवाई करते हुए फर्जी मुकदमा दर्ज कराते हैं।
जानकारी मांगने वालो पर होते हैं एफआईआर
आरटीआई के अधिकतर मामले पंचायत, नगर निगम, ग्रामीण व स्वास्थ्य, शिक्षा, कृषि, राजस्व तथा पुलिस से जुड़े होते हैं। यह देखा गया है कि अगर संबंधित अफसर अनुसूचित जाति या जनजाति का पदाधिकारी है तो वह एससीएसटी एक्ट के तहत उत्पीड़न का मामला दर्ज कराता है और वहीं अगर महिला अफसर है तो छेड़खानी का आरोप लगाते हुए फर्जी एफआइआर दर्ज कराने से गुरेज नहीं करते हैं।
फर्जी मुकदमो की आड में गुनाह छिपाने का प्रयास
दिलचस्प है कि ये फर्जी मुकदमे पुलिस द्वारा आसानी से दर्ज कर लिए जाते हैं। और अगर मामला पुलिस अधिकारी या कर्मचारी से जुड़ा हो तो फिर पूछिए ही मत। वैसे भी अधिसंख्य मामलों में सरकारी कर्मचारी या अधिकारी आरटीआई की अर्जियों पर गौर फरमाना ही लाजिमी नहीं समझते और अगर कहीं से मामला उनके कृत्यों को उजागर करने वाला होता है तो प्रथमदृष्टया आवेदक को डराते-धमकाते हैं और अगर दबाव बढ़ा तो फिर झूठा मुकदमा दर्ज करा देते हैं।
15 साल बाद भी कानून कागजी
सूचना का अधिकार अधिनियम 2005 के तहत यह प्रावधान है कि आवेदक को 30 दिन अंदर संबंधित विभागीय अधिकारी द्वारा उपलब्ध करा दी जाए। इसके लिए लोक सूचना अधिकारी नियुक्त किए गए हैं, किंतु कई मामलों में वांछित जानकारी के लिए लोगों को सालभर से अधिक इंतजार करना पड़ता है और जब लोग अपनी शिकायत लेकर राज्य सूचना आयोग पहुंचते हैं तो वहां भी तय की गई तीस दिन की अवधि में कोई सुनवाई नहीं होती। जिले के रामप्रताप कहते हैं
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